HomeVideos

How Pakistan Trapped Itself in an 81 Trillion Debt | The Untold Story of IMF loans | Budget 2026

Now Playing

How Pakistan Trapped Itself in an 81 Trillion Debt | The Untold Story of IMF loans | Budget 2026

Transcript

504 segments

0:01

जुलाई 1944 की एक दोपहर है। न्यूयॉर्क के

0:04

करीब दरख्तों के झुंड में गिरी इमारत में

0:06

दुनिया भर के सरमायादार जमा है। यहां

0:08

दुनिया का वो माशी निजाम तशकील दिया जा

0:10

रहा था जिसने आगे चलकर एक ऐसे मुल्क में

0:12

भी पेट्रोल की कीमतों को कंट्रोल करना है।

0:14

जिसके दुनिया के नक्शे पर उभरने में अभी 3

0:17

साल बाकी है। यहां वजा किए गए निजाम ने ही

0:20

तय करना था कि 80 साल बाद इस मुल्क का वज़र

0:22

आजम अपने शहरियों से पेट्रोल पर कितना

0:24

टैक्स और कितनी लेवी वसूल करेगा और बजट की

0:27

निवज़ के गरीब रकम पहले ही अलग कर ली जाएगी

0:30

कि यह तो कर्जों की वापसी और इन पर सूद की

0:32

अदायगी में जाएगी। आज जब भी पेट्रोल

0:34

डलवाते हुए आपकी चीखें निकलती है और आप

0:37

हुकूमत से सवाल करते हैं तो बताया जाता है

0:39

कि टैक्स और लेवी की कड़वी गोली निगलनी ही

0:42

पड़ेगी। क्योंकि हुकूमत का तो पेट्रोल की

0:44

कीमत पर कंट्रोल ही नहीं है। शायद हमारी

0:46

इब्तदा में बताई गई कहानी की वजह से आप

0:48

सोच रहे होंगे कि यह सब इसी साजिश का किया

0:51

धरा है जो दूसरी जंग अजीम के इख्तदाम पर

0:53

न्यू अहम शहर में की गई थी। मगर ऐसा

0:55

बिल्कुल नहीं है। क्योंकि पाकिस्तान को

0:56

कर्ज़ों के जाल में जकड़ने के जिम्मेदार

0:58

1944 में जमा होने वाले साहूकार नहीं

1:01

बल्कि हमारे हुक्मरानों और अफसरशाही के वो

1:04

फैसले हैं जिसकी वजह से पाकिस्तान का हर

1:07

शहरी ₹.5 लाख का मकरूस हो चुका है। 1944

1:10

में न्यू अहम शहर में होने वाली इस बैठक

1:12

को ब्रिटन वुड कॉन्फ्रेंस के नाम से याद

1:14

किया जाता है। जहां 44 मुल्कों के

1:16

नुमाइंदों ने आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे

1:19

इदारे बनाकर इस आलमी माशी निजाम की

1:21

बुनियाद रखी। मगर पाकिस्तान ने इन इदारों

1:23

से कर्ज लेना कब और क्यों शुरू किया?

1:25

किसने पाकिस्तान को कर्जों की पॉलिसी पर

1:27

डाला? क्या अमेरिका ने ब्रेटन वुड के

1:29

इदारों यानी आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक को

1:31

पाकिस्तान पर असर अंदाज होने के लिए

1:33

इस्तेमाल किया। पाकिस्तान की कर्ज कहानी

1:35

शुरू करने से पहले ये भी जान लें कि एक

1:36

कर्ज रफ्तार भी महसूस करता है। अपने देखने

1:39

वालों को पूरी बात से आगाह करने का कर्ज़।

1:42

आज के इस दौर में जहां हर बात को घुमा

1:44

फिराकर कहना आम है और बहुत कुछ सेंसर की

1:46

नजर हो जाता है। रफ्तार हकीकी जिंदगी की

1:49

वाक्यात के पीछे छुपी कहानियों तक जाता

1:51

है। यह काम मशक्कत ही नहीं हौसला भी

1:53

मांगता है। हमारा हौसला उस वक्त भरता है

1:55

जब आप रफ्तार के पेट्रियों मेंबर्स बनते

1:58

हैं। तरीका बहुत आसान है। डिस्क्रिप्शन

2:00

में दिए गए लिंक पर क्लिक करें। हमारे

2:02

बहुत सारे नाजरीन ने अब तक रफ्तार को भी

2:04

सब्सक्राइब नहीं किया है। जिसकी वजह से

2:06

हमारी नई डॉक्यूमेंट्रीज इन तक देर से

2:08

पहुंचती है। तो फिर शुरू करते हैं।

2:15

पाकिस्तान बना तो 1949 तक हमारे यहां वही

2:18

करेंसी नोट इस्तेमाल होते रहे जो रिजर्व

2:20

बैंक ऑफ इंडिया छापता था। इन नोटों पर

2:22

तस्वीर बर्तनानिया के बादशाह की होती थी।

2:24

1949 में स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने अपने

2:27

यहां नोट छापना शुरू कर दिए। इसी बरह

2:29

सितंबर में पाउंड स्ट्रेलिंग यानी

2:30

बर्तनानिया की करेंसी की कदर गिर गई। भारत

2:32

ने भी अपना रुपया पाउंड के साथ डीवैल्यू

2:34

कर दिया। लेकिन पाकिस्तान ने

2:35

[गला साफ़ करने की आवाज़] अपने रुपए की

2:36

कदर कम करने से इंकार कर दिया। यूं भारत

2:38

की अशिया पाकिस्तान को सस्ते दामों मिलने

2:40

लगी। भारत इसी जमाने में मशरिक पाकिस्तान

2:42

से पटसन और दीगर इज खरीद कर कोलकाता की

2:45

फैक्ट्रियों में मुख्तलिफ मसूआत तैयार

2:46

करता था। भारत ने मशरिकी पाकिस्तान से

2:48

पटसन खरीदना बंद कर दी जिसका मशरिक

2:50

पाकिस्तान की मूइशत को नुकसान हुआ। भारत

2:52

को एक्सपोर्ट रुकने से वहां पैदा होने

2:54

वाली इज और खाम माल की कीमतें गिर गई।

2:57

मशरिकी पाकिस्तान में पैदा होने वाली

2:58

चीजों की कीमतें गिरने से आवाम में बेचैनी

3:01

और वफाकी हुकूमत के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा

3:03

था। जबकि कराची में बैठी वफाकी हुकूमत भी

3:05

ज़रए मुबादला की कमी से परेशान थी। लेकिन

3:07

फिर शायद खुदाई मदद इस तरह आ पहुंची कि

3:10

जजीरा नुमा कोरिया में जंग शुरू हो गई।

3:12

जिसकी वजह से मशरिकी और मगरबी पाकिस्तान

3:14

से पटसन और कपास की एक्सपोर्ट्स ज्यादा हो

3:16

गई। वक्त तौर पर तो पाकिस्तान का ज़रा

3:18

मुबाला का मसला हल हो गया मगर ये वाक्यात

3:20

दो बड़े अलमियों की बुनियाद रख गए। एक साना

3:23

है मशरिकी पाकिस्तान क्योंकि पहली बार

3:25

मशरिकी पाकिस्तान के आवाम को एहसास हुआ कि

3:27

इनकी पैदा की गई अजनाज़ और खाम माल कराची

3:30

में बैठी वफाकी हुकूमत के लिए अहम नहीं है

3:33

और दूसरा अलमिया ये था कि पाकिस्तानी माशी

3:36

पॉलिसियों की बुनियाद इत्तेफाकात पर पड़

3:38

गई। यानी अगर कोरिया की जंग ना होती तो

3:41

पाकिस्तान के खिलाफ भारत की तिजारती

3:43

बॉयकॉट से पैदा होने वाले बोरान से निकलने

3:45

का क्या रास्ता था? हुक्मरान तबका जिसकी

3:48

फैसलासाजी में सियासतदानों का कम और मफाद

3:51

परस्त सिविल मिलिट्री अफसरशाही का अमल दखल

3:53

ज्यादा था। इस तबके की माशी हिकमत अमली

3:55

बनाने में नाकामी ने पाकिस्तान को बैरूनी

3:58

कर्जों के उस रास्ते पर डाल दिया जिसकी

4:00

वजह से आज पाकिस्तान के कर्जों का मजमुई

4:03

हजम 81000 अरब रुपए तक पहुंच चुका है।

4:06

[संगीत]

4:13

हम सुनते आए हैं कि जब पाकिस्तान बना तो

4:15

वतन अजीज की माली हालत बहुत खराब थी। भारत

4:17

ने असासों का बंटवारा रोक रखा था और बहुत

4:20

कसमोपुरशी की हालत में हुकूमती मामलात

4:22

चलाए जा रहे थे। लेकिन यह भी हकीकत है कि

4:24

कयाम पाकिस्तान के बाद शुरू के अरसे में

4:26

हमें कर्ज लेने की जरूरत ही पेश नहीं आई।

4:29

आजादी मिली तो सुरते हाल कुछ ऐसी थी कि

4:31

बेश्तर सनती यूनिट्स उन इलाकों में थे जो

4:34

भारत के हिस्से में आए। जो ख्ते पाकिस्तान

4:36

के हिस्से में आए वहां की पैदावार ज़र्रात

4:38

थी। पाकिस्तान के लोग कपड़े समेत बेचतर

4:40

अशिया भारत से मंगवा रहे थे। और यह भी वाज़

4:42

था कि दुनिया में वो कौमें तरक्की कर रही

4:44

हैं जहां सनतें लगाई जा रही हैं। बानी

4:47

पाकिस्तान ने सरहद के उस पार से कारोबारी

4:49

खानदानों को पाकिस्तान आकर सनतें लगाने की

4:51

दावत दी। जिनमें आदमजी, हबीब और असफहानी

4:54

खानदान शामिल थे। पाकिस्तान सनती तरक्की

4:56

के रास्ते पर कदम रख चुका था और इसी दौरान

4:59

अपनी ज़र्रेई पैदावार बरामद कर रहा था।

5:01

कोरिया की जंग शुरू हुई तो पाकिस्तान का

5:03

बैलेंस ऑफ पेमेंट सरप्लस हो गया। यानी

5:05

सादा लफ्ज़ों में खजाना भर गया। 1950-51

5:08

में पाकिस्तान का सरप्लस 578 मिलियन था।

5:12

पाकिस्तान इस वक्त सनहतें लगाने के लिए

5:13

बड़े पैमाने पर मशीनरी इंपोर्ट कर रहा था।

5:16

जिसकी वजह से बैलेंस ऑफ पेमेंट बस दो बरस

5:18

ही सरप्लस रह सका। और जिस तरह जजीरामा

5:20

कोरिया की जंग पाकिस्तान के लिए नेमत

5:23

साबित हुई थी उसी तरह अगला इत्तेफाक

5:25

पाकिस्तान को माशी मुश्किल में डाल गया और

5:27

वो इत्तेफाक थे 1951 [संगीत]

5:29

और 52 के तबाहकुन मानसून सीजन। बारिश की

5:32

वजह से मुल्क में जराई पैदावार इतनी गिरी

5:34

कि मुल्क में खुराक की किल्लत पैदा हो गई।

5:36

यानी एक साल पहले तक का अंदाजा यही था कि

5:39

मुल्क में गंदुम की सरप्लस पैदावार होगी।

5:41

लेकिन बारिशों ने वो हाल किया कि

5:43

पाकिस्तान गंदुम के लिए भी कर्ज लेने पर

5:45

गौर करने लगा। शायद पाकिस्तान इसी साल

5:47

अमेरिका से कर्ज ले लेता। मगर उस वक्त के

5:50

अमेरिकी वज़र खारजा जॉन फॉस्टर ड्यूस ने

5:52

सदर आइजन हावर्ड को मशवरा दिया कि

5:54

पाकिस्तान को गद्दुम के लिए कर्ज देने के

5:56

बजाय ग्रांट दे दी जाए। वाशिंगटन की यह

5:59

मेहरबानी उन सिक्योरिटी ताल्लुकात के लिए

6:01

थी जो आगे चलकर सीटों और सेंटो की सूरत

6:03

में काम आई और वो तस्वीर आज भी रिकॉर्ड का

6:06

हिस्सा है। जब कराची की बंदर रोड से गंदुम

6:08

से लदी ऊंट गाड़ियां गुजर रही थी और ऊंटों

6:11

के गले में थैंक्यू अमेरिका की तख्तियां

6:13

लटकी हुई थी। इससे पहले अमेरिका पाकिस्तान

6:15

को 1948 में भी महाजरीन की आबादकारी के

6:18

लिए $1 करोड़ कर्ज दे चुका था। मगर इस

6:20

वक्त पाकिस्तान की जरूरत इतनी शदीद नहीं

6:23

थी। जैसी कि 1952 में रोटी के लाले पड़े

6:26

हुए थे। साबिक गवर्नर स्टेट बैंक इशरत

6:28

हुसैन ने अपनी किताब पाकिस्तान द इकॉनमी

6:29

ऑफ एलिटिस स्टेट में लिखा है कि इस वक्त

6:32

की हुकूमत मगरबी पाकिस्तान में

6:34

इंडस्ट्रियलाइजेशन पर जोर दे रही थी।

6:36

मशरिकी पाकिस्तान जो पटसन का बड़ा

6:38

एक्सपोर्टर था वहां जरात के फरोख्त पर कोई

6:40

तवज्जो नहीं दी गई। बल्कि मगरबी पाकिस्तान

6:42

में भी जरई शोबे को नजरअंदाज किया गया।

6:44

डॉक्टर इशरत हुसैन के बकौल यह सब जरई शोबे

6:47

से हुकूमती तासुब का ही नतीजा था कि

6:49

पाकिस्तान जैसे जरई मुल्क को खुराक भी

6:51

इंपोर्ट करना पड़ी और जब आमदन अठन्नी और

6:53

खर्च रुपैया हो तो बिल आखिर हथेली मांगने

6:56

के लिए फैलाना ही पड़ती है।

7:03

पाकिस्तान ने अपना पहला कर्जा मार्च 1952

7:06

में इंटरनेशनल बैंक ऑफ रिकंस्ट्रक्शन एंड

7:08

डेवलपमेंट से लिया था। $ करोड़ 70 लाख का

7:10

यह कर्ज बजाहिर तो रेलवे की बहाली के लिए

7:12

लिया गया था। मगर कर्ज देने वाले वर्ल्ड

7:15

बैंक की 27 मार्च 1952 की दस्तावेज बताती

7:18

है कि असल वजा कुछ और थी। इस दस्तावेज में

7:21

लिखा गया है कि कोरिया की जंग से

7:22

पाकिस्तान की मशत में जो तेजी आई थी वो

7:25

खत्म हो गई है। लेकिन तरक्कियाती अखराजात

7:27

बदस्तूर बढ़ रहे हैं। क्योंकि अदायगियां

7:29

उन मंसूबों के लिए की गई है जो ज्यादा

7:32

आमदन वाले दिनों में शुरू किए गए थे। यहां

7:34

तक कि तरियाती अखराजात अब दफाई अखराजात से

7:36

ज्यादा हो गए हैं। 1952 में ही पाकिस्तान

7:39

ने ज़रात के लिए $3.5 लाख का कर्जा ले लिया

7:42

और फिर जून 1954 में सुई गैस पाइपलाइन के

7:44

लिए $5 मिलियन का कर्जा ले लिया गया। 1955

7:47

में पाकिस्तान ने अमेरिका से 110 मिलियन

7:50

का कर्जा ले लिया। और इसके बाद तो आदत सी

7:53

हो गई। हम कर्जे लेकर तरक्की कर रहे थे।

7:55

गालिब ने शायद हम जैसों के लिए ही कहा था।

7:57

कर्ज की पीते थे मैं लेकिन समझते थे कि

8:00

हां रंग लावेगी हमारी फाका मस्ती एक दिन।

8:04

यह तो हमारी कर्ज कहानी का आगाज था। अभी

8:06

तो 1965 की जंग नहीं हुई थी। अय्यूब खान

8:09

का पहला मार्शल लॉ नहीं आया था। भुट्टो की

8:11

नेशनलाइजेशन की पॉलिसी नहीं आई थी और

8:13

जियाउल हक का अफगान जिहाद भी बाकी था।

8:15

1990 का अशरा जिया तो अभी बहुत दूर था।

8:19

जैसा कि हम इब्तदा में ही बता चुके हैं कि

8:21

जुलाई 1944 की ब्रिटेन वुड कॉन्फ्रेंस में

8:23

बनने वाला आलमी मालियाती निजाम दुनिया की

8:25

मशत को एक दूसरे से जोड़ चुका था। आलमी

8:28

मालियाती निजाम पर कंट्रोल कायम करने के

8:30

लिए इस कॉन्फ्रेंस में दो इदारे कायम किए

8:32

गए थे। पहला इंटरनेशनल बैंक फॉर

8:34

रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट जिसे आगे

8:36

चलकर वर्ल्ड बैंक का नाम दिया गया और

8:38

दूसरा इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड या आईएमएफ।

8:41

वर्ल्ड बैंक जंग के बाद तामीर नौ और

8:43

तरकियाती कामों के लिए कर्ज देता था।

8:46

पाकिस्तान ने आर्मी बैंक से 1952 में कर्ज

8:48

लेना शुरू कर दिया था। जबकि आईएमएफ बैलेंस

8:51

ऑफ पेमेंट के मसले का शिकार मुल्कों को

8:52

कर्ज देता और रोड मैप तजवीज करता है। यानी

8:55

आमदन से ज्यादा खर्च करने वाले पाकिस्तान

8:57

जैसे मुालिक जैसा कि हम बता चुके हैं कि

8:59

पाकिस्तान 1952 में ही आर्मी बैंक से कर्ज

9:02

ले चुका था। आईएमएफ के पास जाने में भी

9:04

ज्यादा अरसा नहीं लगा। वर्ल्ड बैंक से

9:06

पहला कर्ज लेने के सिर्फ 6 साल बाद यानी

9:09

1958 में पाकिस्तान आईएमएफ के पास भी

9:11

पहुंच चुका था।

9:17

अक्टूबर 1958 में जनरल अयूब खान ने जब

9:20

इ्तदार पर कब्जा करके मार्शल लॉ लगाया तो

9:22

मुल्क गैर यकीनी सुरते हाल का शिकार था और

9:25

मार्शल लॉ लगाने के सिर्फ दो माह बाद ही

9:27

नई फौजी हुकूमत ने आईएमएफ का दरवाजा खटखटा

9:30

दिया। यह 25 मिलियन डॉलर के स्पेशल

9:33

ड्राइंग राइट्स का स्टैंड बाय अरेंजमेंट

9:34

था। मगर इस वक्त अयूब खान की हुकूमत को इस

9:37

अरेंजमेंट से रकम निकलवाने की जरूरत ही

9:39

नहीं पड़ी और आईएमएफ से हुआ मुहायदा मंसूफ

9:42

कर दिया गया। लेकिन यह मालियाती सुरते हाल

9:44

65 की पाक भारत जंग की वजह से बरकरार ना

9:47

रह सकी। पाकिस्तान को 1965 में आईएमएफ से

9:49

$3 करोड़ 70 लाख का कर्ज लेना पड़ा और फिर

9:52

तीसरी बार 1968 में भी आईएमएफ के पास जाना

9:56

पड़ा। जहां से पाकिस्तान ने $7.5 करोड़ का

9:59

लोन प्रोग्राम लिया। यानी अय्यूब खान के

10:01

दौरे हुकूमत तक ही पाकिस्तान आईएमएफ के

10:03

तीन प्रोग्राम ले चुका था। बैनुल अकवामे

10:06

इत्तेफाकात के पाकिस्तान की मईत पर असरात

10:08

के आदादो शुमार भी बहुत दिलचस्प है।

10:10

अमेरिका और सोवियत यूनियन की कोल्ड वॉर के

10:12

दिनों में जब पाकिस्तान ने सीटो और सेंटो

10:14

के मुहायदे किए तो पाकिस्तान की शराए नमूद

10:18

8% से बढ़कर 6.6% तक पहुंच गई। यही वजह है

10:21

कि 1965 में जब पाक भारत जंग के दौरान

10:24

पाकिस्तान की गैर मुल्की इमदाद अचानक बंद

10:26

हुई तो अय्यूब खान को आईएमएफ के पास जाना

10:29

पड़ गया। 1971 में पाकिस्तान टूटा और फिर

10:31

भुट्टो के दौर का आगाज हुआ। भुट्टो हुकूमत

10:34

ने 1972, 73 और 74 में कर्ज लिए। यानी

10:37

भुट्टो हुकूमत ने पहले 3 साल में हर साल

10:40

एक आईएमएफ प्रोग्राम लिए और फिर 3 साल बाद

10:43

यानी 1977 में चौथा प्रोग्राम लेकर

10:46

पाकिस्तान के आईएमएफ प्रोग्राम की तादाद

10:48

सात तक पहुंचा दी। जनरल जियाउल हक ने

10:50

जुलाई 1977 में जुल्फकार अली भुट्टो का

10:53

तख्ता उलट कर इ्तदार पर कब्जा किया। तो

10:55

इब्तदाई 3 साल तक तो जैसे तैसे गुजारा हो

10:58

गया। मगर 1980 और 81 में जनरल जिया की

11:01

हुकूमत ने भी दो बार आईएमएफ से कर्ज

11:03

प्रोग्राम ले लिया। मगर 1952 की तरह इस

11:06

बार भी एक इत्तेफाक पाकिस्तान को माशी

11:08

मुश्किलात से निकालने का सबब बन गया। और

11:10

वो था अफगानिस्तान पर रूस का हमला और

11:13

कब्जा और इसके खिलाफ मज़ामत का आगाज़। अफगान

11:16

जिहाद में तेजी आने के बाद अमेरिका से

11:17

डॉलरों की आमद भी तेज हुई तो जनरल जिया के

11:20

बाकी मांदा दौर में पाकिस्तान को कर्ज

11:22

लेने की जरूरत नहीं पड़ी। जनरल जियाउक के

11:25

बाद जमूरियत बहाल हुई। मेनज़र ने अपनी

11:27

हुकूमत के पहले ही साल यानी 1988 में दो

11:30

बार आईएमएफ से कर्ज ले लिया। एक बार 382

11:33

मिलियन और दूसरी बार 273 मिलियन डॉलर्स का

11:36

कर्ज मंजूर किया गया। यानी कि 1990 का

11:39

अशरा जिसे माशी तारीख में अशरा जिया कहा

11:42

जाता है। इसके शुरू होने से पहले ही

11:44

पाकिस्तान के आईएमएफ लोंस प्रोग्राम की

11:46

तादाद 11 हो चुकी थी।

11:53

1990 में नवाज शरीफ पहली बार वज़र आजम बने

11:56

तो अगले ढाई साल तक सियासी लड़ाइयों की वजह

11:58

से मशत भी अदम इस्तकाम का शिकार रही।

12:01

जुलाई 1993 में काकड़ फार्मूले के तहत नवाज

12:04

शरीफ हुकूमत का खात्मा हुआ तो मुल्की मशत

12:06

इस मुकाम पर पहुंच चुकी थी कि आईएमएफ के

12:09

पास जाने के लिए अगली हुकूमत का इंतजार

12:11

करना भी मुमकिन नहीं था। नतीजे में मोईन

12:13

कुरैशी की निग्राह हुकूमत को ही आईएमएफ के

12:16

पास जाना पड़ा और पाकिस्तान के लिए 265

12:18

मिलियन डॉलर का कर्ज प्रोग्राम मंजूर हुआ।

12:20

अक्टूबर 1993 में बेनजीर भुट्टो के दूसरी

12:23

बार वज़र आजम बनने के चंद माह बाद फरवरी

12:26

1994 में पाकिस्तान ने आईएमएफ से दो कर्ज

12:29

प्रोग्राम किए। एक प्रोग्राम $60 मिलियन

12:32

और दूसरा 172 मिलियन का था। बेनजीर भुट्टो

12:36

ने अपने दूसरे दौरे हुकूमत में आईएमएफ से

12:38

तीसरा लोन प्रोग्राम दिसंबर 1995 में 562

12:42

मिलियन का लिया। 1997 में नवाज शरीफ ने

12:45

दूसरी बार वज़र आजम बनने के बाद आईएमएफ से

12:48

दो लोन प्रोग्राम लिए। जिनमें से एक 682

12:51

मिलियन और दूसरा 265 मिलियन का था।

12:55

अक्टूबर 1999 में जनरल मुशर्रफ ने नवाज

12:57

शरीफ का तख्ता उल्टा तो उस वक्त भी मुल्क

12:59

की माशी सुरते हाल नाजुक थी जो मार्शल लॉ

13:02

के बाद मज़द बिगड़ गई। नतीजे में एक साल

13:05

बाद फौजी हुकूमत भी आईएमएफ के दरवाजे पर

13:07

खड़ी थी। मुशर्रफ हुकूमत ने नवंबर 2000

13:10

में 465 मिलियन और इसके एक साल बाद 1 अरब

13:14

33 करोड़ का आईएमएफ लोन प्रोग्राम लिया।

13:17

मगर एक बार फिर एक इत्तेफाक पाकिस्तान की

13:20

ज़बोहाल मईत को सहारा देने आ पहुंचा और वो

13:23

था अमेरिका पर 11 सितंबर के हमलों के बाद

13:26

अफगानिस्तान के खिलाफ शुरू होने वाली

13:27

मुहिम। पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका का

13:30

इत्तेहादी बना और वाशिंगटन से इस्लामाबाद

13:32

को डॉलर्स की सप्लाई बहाल हो गई। और इसके

13:35

बाद जब तक जनरल मुशर्रफ इख्तेदार में रहे,

13:37

पाकिस्तान को आईएमएफ के पास जाने की जरूरत

13:39

नहीं पड़ी। क्योंकि इत्तेफाक से दहशतगर्दी

13:41

के खिलाफ जंग जारी थी और पाकिस्तान

13:43

अमेरिका का सफ़े-अवल का इत्तेहादी था।

13:50

परवेज मुशर्रफ़ की इख्तेदार से बेदखली के

13:53

बाद जम्हूरियत के साथ ही आईएमएफ प्रोग्राम

13:55

का भी आगाज हो गया। 2008 में पीपल्स

13:57

पार्टी और 2013 में मुस्लिम लीग नून ने

14:00

आईएमएफ से कर्ज लिया। एक बार फिर माशी

14:02

इत्तेफाक यह हुआ कि सीपक प्रोग्राम का

14:05

आगाज हुआ। जिसकी वजह से डॉलर्स की कमी

14:07

वक्त तौर पर दूर हो गई। मगर इसका असर भी

14:10

चंद साल ही बरकरार रह सका। 2019 में इमरान

14:13

खान की हुकूमत को भी सारी कोशिशें करने के

14:15

बावजूद आईएमएफ के पास जाना ही पड़ा। 2023

14:18

में पीडीएम हुकूमत और 2024 में मौजूदा

14:21

हुकूमत ने कर्ज लिया। मजमुई तौर पर

14:23

पाकिस्तान 24 मर्तबा आईएमएफ से कर्ज ले

14:26

चुका है। लेकिन हर नया कर्ज पहले से

14:29

ज्यादा सख्त है। और इसकी वजह पाकिस्तान का

14:31

हर बार आईएमएफ से किए गए वादों से

14:34

प्रोगर्दानी है। माशी तजिया निगार इस बात

14:36

पर मुत्तफिक है कि इब्तदाई वर्षों में

14:38

आईएमएफ ने कोई खास शरायत नहीं लगाई। लेकिन

14:41

1980 के बाद पाकिस्तान को जो कर्ज मिले

14:44

इनके साथ हर मर्तबा मुतालिबात की फहरिस्त

14:47

भी आई। इन मुतालबात ने पाकिस्तानी मईत और

14:49

आम आदमी को कैसे मुतासिर किया और क्या

14:52

पाकिस्तान कर्ज लेने से बच सकता था?

14:54

डॉक्टर इशरत हुसैन की बात पर जाएं तो ऐसा

14:56

बिल्कुल मुमकिन था। अगर आईएसआई रिजीम ना

14:59

होता। आईएसआई रिजीम से मुराद वो नहीं है

15:02

जो आप समझ रहे हैं। यहां इसका मतलब है

15:04

इंपोर्ट सब्सीट्यूशन इंडस्ट्रियलाइजेशन।

15:07

यानी हुकूमत की जानिब से उन अशिया की

15:09

सनतों को लगाने की हौसला अफजाई किया जाना

15:12

जो इंपोर्ट करना पड़ रही थी। यह पॉलिसी

15:14

बजादे खुद इतनी बुरी नहीं है। लेकिन जब

15:17

इसके लिए हुकूमत इंपोर्ट्स पर ज्यादा

15:19

ड्यूटीज लगाती है और मुकामी सनतकारानों पर

15:21

मरात की बारिश करती है तो हमारे जैसे

15:24

मुल्कों में सनतकार इसका नाजायज फायदा

15:26

उठाते हैं। 1950 के अश्र में मायाशी

15:28

पॉलिसी एडहॉकिज्म की बुनियाद पर चलाई गई।

15:30

इंपोर्ट्स पर आए रोज पाबंदी लगाकर मुकामी

15:33

मैन्युफैक्चरर्स को मरात दी गई। डॉक्टर

15:35

इशद हुसैन के बकौल इसके नतीजे में

15:37

सनतकारों की एक नई क्लास वजूद में आ गई।

15:39

जिसने कोरिया की जंग के दौरान बड़े पैमाने

15:42

पर दौलत जमा कर ली थी। लेकिन बदकिस्मती से

15:44

इस पॉलिसी से पाकिस्तान में रैंड सीकिंग

15:46

करने वाले दौलतमंदों की तादाद बढ़ती चली

15:48

गई। मशत में रैंड सीकिंग का मतलब होता है

15:51

कि कोई नई जिद्द, पैदावारी वैल्यू या दौलत

15:54

पैदा किए बगैर हुकूमती पॉलिसियों से फायदा

15:56

उठाकर ज्यादा से ज्यादा फायदा हासिल करना।

15:59

इशरत हुसैन की किताब से हमें यह भी मालूम

16:01

होता है कि जो लोग यह माल कमा रहे थे, इन

16:04

पर टैक्स लगाने का कोई तरीका ही मौजूद

16:06

नहीं था। क्योंकि ऐसे इदारे ही कायम नहीं

16:08

किए गए या कायम होने ही नहीं दिए गए।

16:11

जिसके नतीजे में बैलेंस ऑफ पेमेंट की

16:13

सुरते हाल बेहतर होने के बजाय मजीद खराब

16:15

हो गई। अयूब खान ने अपने दौर में रैंड

16:17

सीकिंग रोकने पर तवज्जो नहीं दी और अगर इस

16:20

वक्त रैंड सीकिंग पर कंट्रोल कर लिया जाता

16:22

तो शायद हालात इतने ना बिगड़ते। 1968 में

16:25

प्लानिंग कमीशन के सरबरा महबूबुल हक ने वो

16:28

तारीखी बयान दिया कि पाकिस्तान में दौलत

16:30

और कारोबार 22 खानदानों के हाथ में आ गया

16:33

है। इस बयान में कितनी सच्चाई थी यह तो तय

16:36

नहीं हो सका। लेकिन महबूबुल हक के इस दावे

16:39

से अयूब खान के खिलाफ आवामी गुस्से को हवा

16:42

जरूर मिली। जबकि जायज तौर पर समाया लगाकर

16:44

सनतें कायम करने वाले भी नफरत का शिकार हो

16:46

गए। 1971 की जंग के बाद पाकिस्तान की मशत

16:49

पहले ही मुल्क टूटने के सदमे से निकलने की

16:51

कोशिश करती रही और फिर 1974 के तेल बोरान

16:55

ने आ लिया। पेट्रोलियम कीमतें चार गुना

16:57

बढ़ गई। 1972 में रुपए की कदर में पहली

17:00

बार बड़ी कमी हुई। महबूबुल हक के 22

17:03

खानदान वाले बयान की गूंज अभी फिजा में

17:05

बाकी थी। भुट्टो की कौमयाने या

17:07

नेशनलाइजेशन की पॉलिसी सामने आई। लेकिन

17:09

इत्तेफाक फिर मंसूबाबंदी पर भारी पड़ गया।

17:12

तेल का बोरान सब कुछ ले डूबा। भुट्टो दौर

17:14

में पाकिस्तान की बरामदाद में इजाफा जरूर

17:16

हुआ लेकिन तेल ने इंपोर्ट बिल बढ़ा दिया।

17:19

कर्ज का बोझ बढ़ता गया। इस दौर में $39

17:22

अरब डॉलर के कर्जे लिए गए। हालात मजीद

17:24

खराब होते अगर गरीब मजदूर पाकिस्तान के

17:27

काम ना आता। 1970 की दहाई में पाकिस्तान

17:30

से मेहनतकशों के खलीजी रियासतों के जाने

17:32

का सिलसिला तेज हो गया। इनकी तरसीलात जर

17:34

बढ़ गई। 1972 में यह रकम सिर्फ ₹3 करोड़

17:38

60 लाख थी। 1980 में यह $1 अरब 74 करोड़

17:42

40 लाख हो गई। 80 के अशरे में जब जियाउल

17:45

हक़ पाकिस्तान पर बरसरे इख्तेदार थे, तो

17:48

बैरू मुल्क पाकिस्तानी सालाना $3 अरब डॉलर

17:51

भेज रहे थे। जो जीडीपी का 5 फ़ीद बनते थे।

17:54

अफगानिस्तान पर सोवियत यूनियन के हमले के

17:56

बाद पाकिस्तान फ्रंट लाइन स्टेट बन गया।

17:58

लेकिन अमेरिका अब दोस्त नहीं रहा था। बॉस

18:01

बन गया था। इशरत हुसैन लिखते हैं कि इससे

18:04

पहले इमदाद का मतलब ग्रांट था और अब इमदाद

18:07

कर्ज हो गई। इसमें कोई शको शुबा नहीं कि

18:09

जियाउल हक के दौर में दौलत की रेल पेल थी।

18:12

आईएमएफ से पहले $5 अरब डॉलर की किस्त

18:14

मंजूर कराई गई और फिर 919 मिलियन की लेकिन

18:18

पहली बार सिर्फ $349 मिलियन निकलवाने पड़े

18:22

और दूसरी बार $30 मिलियन। यानी मईत इतनी

18:26

बदहाल नहीं थी कि संभल ना पाती। शर्त यह

18:29

है कि कोई संभालने वाला होता। उस दौर में

18:31

बेहतरी आने के बजाय पाकिस्तानी मईत के दो

18:33

नए दुश्मन सामने आ गए। एक ये कि टैक्स ना

18:36

देने वाले बढ़ गए। गैर दस्तावेजी मईत का

18:38

हजम जीडीपी का 8% हो गया। दूसरा दुश्मन

18:41

पाकिस्तान से सरमाए का इंखिला था। 1989

18:44

में मोहसिन खान ने कैपिटल फ्लाइट फ्रॉम

18:46

पाकिस्तान में बताया कि कैसे पाकिस्तान से

18:48

लोग सरमाया निकाल कर ले जा रहे हैं। याद

18:50

रहे कि यह 36 बरस पुराना मजमून है। 2026

18:53

में वजीर दाखला मोहसिन नकवी 100 अरब

18:56

पाकिस्तान से बाहर जाने का बयान देते हैं

18:58

और ताजों से दरख्वास्त करते हैं कि इसका

19:01

30% ही वापस ले आएं। आप अंदाजा कर सकते

19:04

हैं कि 36 वर्षों में जो सरमाया बाहर गया

19:06

वो पाकिस्तान को कहां पहुंचा सकता था।

19:09

रेंट सीकिंग टैक्स ना देने और सरमाए को

19:11

बाहर ले जाने का जो सिलसिला पिछली सदी के

19:14

पाकिस्तान में शुरू हुआ वो आज तक जारी है।

19:16

माशी खुद मुख्तारी को हर दौर में जाती और

19:19

सियासी मफाद पर कुर्बान किया गया। पिछले

19:22

79 बरस के दौरान पाकिस्तान का कर्ज हर दौर

19:24

में बढ़ा है। 1958 तक पाकिस्तान का कुल

19:27

बैरूनी कर्जा सिर्फ 150 मिलियन के लगभग

19:30

था। मुल्क ज्यादातर अपनी आमदनी और महदूद

19:32

बैरूनी इमदाद पर चल रहा था। अय्यूब खान के

19:35

दौर में 1969 तक बैरूनी कर्जा 2.7 अरब

19:39

डॉलर हो गया। भुट्टो दौर में 1977 तक

19:41

बैरूनी कर्जा बढ़कर 6.3 अरब डॉलर यानी

19:45

तकरीबन 97 अरब तक पहुंच गया। जियााउल हक

19:48

के दौर में अफगान जंग की वजह से अमेरिका

19:50

से बड़ी इमदाद मिली। लेकिन कर्जा भी बढ़ा।

19:53

1988 तक मजमूई कर्जा 550 अरब से तजावुज़

19:56

कर गया। बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ की

19:59

बारियों के दौरान सियासी अदम इस्तेकाम

20:01

रहा। 1999 तक मजमुई कर्जा ₹2946 अरब हो

20:05

गया। मुशर्रफ दौर के आगाज़ पर कर्जा ₹2,946

20:09

अरब था जो 2008 तक बढ़कर ₹6,127 अरब हुआ।

20:14

आसिफ ज़दारी के दौर में कर्जा 6127 अरब से

20:18

बढ़कर 14,292

20:20

अरब हुआ। यानी तकरीबन 133% इजाफा हुआ।

20:25

नवाज शरीफ दौर में सीपैक और बिजली के

20:27

मंसूबों के लिए कर्जे लिए गए और मजमुई

20:30

कर्जा ₹24,953

20:32

अरब तक पहुंच गया। इस दौर में 75% इज़ाफा

20:36

हुआ। इमरान खान के दौर में कर्जा 49,242

20:40

अरब हो गया। यानी 97% इज़ाफा। और इस वक्त

20:45

ये कर्जा 81,000 अरब से तजावुज़ कर चुका

20:49

है। अगर पूछा जाए कि ये रकम कहां गई? तो

20:51

जवाब आप जानते हैं। लेकिन तकलीफ सिर्फ इस

20:54

कर्ज की नहीं हर साल पाकिस्तान अपने बजट

20:57

के निस्त के करीब रकम कर्जों की इकात और

21:00

सूद की अदायगी पर खर्च करता है। जिसे डे

21:02

सर्विसिंग कहते हैं। रवा बरस के बजट में

21:05

₹8000 से जायद रकम डे सर्विसिंग के लिए

21:08

मुख्तस की गई है। जो मजमुई बजट का 47%

21:12

बनती है। सेहत और तालीम की तो क्या बात की

21:14

जाए। पाकिस्तान का दफाई बजट भी इस रकम का

21:16

सिर्फ एक तिहाई है। [संगीत] यानी कर्ज की

21:19

पीपी के में हमने दुकान गैर से कैफ और

21:22

मस्ती के हर एक इमका को इगवा कर लिया।

Interactive Summary

यह वीडियो पाकिस्तान के कर्जों में जकड़े जाने की ऐतिहासिक यात्रा का विश्लेषण करता है। इसमें 1944 के ब्रेटन वुड कॉन्फ्रेंस से लेकर वर्तमान तक की आर्थिक नीतियों, गलत फैसलों और अफसरशाही के प्रभाव को उजागर किया गया है। यह वीडियो बताता है कि कैसे आईएमएफ और विश्व बैंक से लिए गए कर्ज, कोरिया की जंग और अफगान जिहाद जैसे संयोगों और देश में रेंट सीकिंग व पूंजी के पलायन जैसी समस्याओं ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को आज के संकटपूर्ण हालात (81,000 अरब रुपये का कर्ज) तक पहुँचा दिया है।

Suggested questions

3 ready-made prompts