Who's Responsible for Pakistan Cricket's Downfall? | The Hard Truth (Must Watch)
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6 जून 2024 T20 वर्ल्ड कप का ग्रुप मैच
सनसनीखेज मरहले में दाखिल हो चुका है। मैच
का सिर्फ एक ओवर बाकी है और इसमें जीतने
के लिए 15 रंस दरकार हैं। छह बॉल्स पर 15
रन माहौल टेंस है। शायकीन शोर मचाने के
बजाय उंगलियां हाथों में दबाए बैठे हैं।
टीवी स्क्रीन्स के सामने मौजूद बुजुर्ग
मैच को इस हालत तक पहुंचाने पर टीम को कोस
रहे हैं। और बच्चे धुआ के लिए हाथ उठाए
हुए हैं। ओवरऑल पाकिस्तान की पोजीशन बेहतर
है क्योंकि पाकिस्तान बॉलिंग साइड पर है
और सामने कोई मजबूत टीम नहीं बल्कि ऐसी
टीम है जो पहली दफा ICC टूर्नामेंट खेल
रही है जो पहली दफा ICC टूर्नामेंट खेल
रही है। आखिरी ओवर कराने का कुर्रा हारिस
रऊफ के नाम निकलता है। ओवर शुरू होता है।
पहली तीन बॉल्स पर तीन ही रन बनते हैं। अब
तीन बॉल पर 12 रंस दरकार हैं। मैच पर
पाकिस्तान की गिरफ्त मज़द मजबूत हो जाती
है। चौथी गेंद फैसला कुन थी। हारिस रऊफ के
कदम तेजी से उठे। गेंद भी बिजली की तेजी
से निकलकर बैटर की तरफ गई। मगर नतीजा यह
बता रहा था कि उनका दिमाग गेंद की स्पीड
को मैच करने में नाकाम रहा। बॉल बाउंड्री
के पार जागी।
अगली बॉल पर एक रन बना। अब आखिरी बॉल पर
पांच रंस चाहिए थे। वक्त थम गया। पलकें
झपकना भूल गई। शायकीन कुर्सियों से खड़े
हो गए। सबकी नजरें टीवी पर जम गई और फिर
जो कुछ हुआ उस पर किसी को यकीन ना आया।
बॉल हारिस रऊफ के सर के ऊपर से गुजरती हुई
और एक-दो बाउंस लेकर बाउंड्री पार कर गई।
12 में से 11 रंस बन गए। स्कोर लेवल हो
गया। सुपर ओवर हुआ और पूरे मैच में थका
हुआ पाकिस्तान। सुपर ओवर के बाद हारा
पाकिस्तान बन गया।
शर्म आनी चाहिए इनको एनालिसिस करते हुए कि
अमेरिका ने अच्छी क्रिकेट खेली। अबे तो जो
गंदी खेली है उसको उस गंद में डाल क्यों
नहीं रहा है?
वर्ल्ड कप के पहले मैच में अमेरिका ने
पाकिस्तान को शिकस्त दे दी। यह सिर्फ एक
अपसेट नहीं ज़वाल की निशानी थी। कुदरत के
निजाम में तहफुज़ ढूंढने वालों की इज्जत की
नीलामी थी। टैलेंट की कलाई खुलने की कहानी
थी और क्रिकेट बोर्ड को सियासी जमात का
दफ्तर बनाने की सजा थी। जो पूरी कौम ने
पाई थी।
बाबर ने बात बोली हम भी छे ओवर अच्छे नहीं
खेले। किसने मना करा था?
तुझे बताया ना किसने मना करा था? क्या
दिमाग नहीं था कि जो बोंगी मार के आउट हुए
हैं।
इस शर्मनाक शिकस्त के तीन दिन बाद एक और
हार्ड ब्रेकिंग मूवमेंट आया। जहां
पाकिस्तान 20 ओवर में 120 रन का टारगेट
पूरा नहीं कर पाया। और फिर बांग्लादेश से
टेस्ट सीरीज में वाइट वॉश हुआ। जिंबाब्वे
से हारना हो या एशिया कप के तीनों मैचों
में इंडिया के सामने फेलियर। पाकिस्तानी
टीम हर फॉर्मेट और हर मैदान में अपने कद
से कई ज्यादा छोटी टीम नजर आई है। और
पाकिस्तानी टीम की अनप्रिडिकटेबल
परफॉर्मेंस के आधी फैंस भी चीख उठे कि
पाकिस्तानी टीम को हो क्या गया है? हमारे
ज़हन में भी यही सवाल आया और आज इस वीडियो
में हम इसका जवाब जानने की कोशिश करेंगे।
कौमी असेंबली में आईनी तरमीम मंजूर हो गई
है। वज़र आजम कह रहे हैं कि अगले 3 साल में
मुल्क में तरक्की का दौर दौरा होगा।
हुकूमत अपने माशी अदाब हासिल करने में
नाकाम हो गई। यहां यह भी लिखा है कि दफाई
बजट में 10% इजाफा हो गया। कराची में
ग्रिड की खराबी की वजह से लोड शेडिंग का
सिलसिला 10 घंटे तक जारी रहा। आपको मजे की
बात बताऊं ये अखबार आज का नहीं। 20 मई
2016 का एडिशन है। यानी पूरे 10 साल
पुराना। 10 साल पहले भी हमारे यहां यही
मसाइल थे। लोड शेडिंग, खराब मशत,
दहशतगर्दी इन मसाइल से लाता अपनी अय्याशी
में मशरूफ हुक्मरान। दिलावर फिगार के बकल
हालात हाजरा को कई साल हो गए। हम सालों से
इन मुश्किलात में रह रहे हैं और इनको अपनी
जिंदगी का हिस्सा बना चुके हैं। लेकिन इन
तमाम मुश्किलात में अगर कोई एक खबर हमारे
चेहरों पर मुस्कुराहट लाती थी तो वो
पाकिस्तान क्रिकेट टीम की कामयाबी की खबर
थी। मुल्क के सियासी हालात जैसे भी हो
क्रिकेट खुशी-खुशी और जीत की उम्मीद के
साथ देखते थे। और पाकिस्तानी टीम कभी
कबभार हार्ड प्लेक्स देने के बावजूद अक्सर
उन उम्मीदों पर पूरी भी उतरती थी। और
लोगों को चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही
उनकी जिंदगी के गम भुला देती थी।
83 में पाकिस्तान ऑस्ट्रेलिया को टेस्ट
सीरीज में वाइट वाश कर रहा था तो मुल्क
जिया के मार्शल लॉ की तारीख में डूबा हुआ
था। 92 में इमरान खान ने जब वर्ल्ड कप
उठाया तो कराची में फौजी ऑपरेशन की तैयारी
हो रही थी। 2009 में यूनिस खान टी20 का
जश्न मना रहे थे तो मुल्क दहशत गर्दी की
लपेट में था और 2017 में सरफराज अहमद
इंडिया को शिकस्त देकर चैंपियन ऑफ द
चैंपियंस का टाइटल ले रहे थे। मुल्क में
पानामा का हंगामा चल रहा था। क्रिकेट मैच
में फतह वो नशा था जो पाकिस्तानियों को हर
मुश्किल भुला देता था। मगर कुछ अरसे से
पाकिस्तानियों के लिए क्रिकेट खुद एक दर्द
सर बन गया है। चेहरों पर खुशी लाना तो दूर
वो बची कुची मुस्कुराहट भी छीन ले गया है।
तो आइए चलते हैं पाकिस्तानी क्रिकेट के
डाउनफॉल की कहानी की तरफ। लेकिन पहले वही
दरख्वास्त। सब्सक्राइब करें और
एक्सक्लूसिव कंटेंट के लिए पैट्रॉन मेंबर
जरूर बने। या
चले कुछ पीछे चलते हैं और शुरू से शुरू
करते हैं। आजादी के कुछ महीने बाद यानी यक
मई 1948 को बीसीसीपी यानी बोर्ड ऑफ
कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन पाकिस्तान तशकील
दिया गया और इसके पहले सरबरा जस्टिस
कार्नेलियस बने। 1952 में पाकिस्तानी टीम
अब्दुल हफीज कारदार की कयादत में अपनी
पहली इंटरनेशनल सीरीज के लिए भारत गई।
जहां पांच टेस्ट मैचेस की सीरीज भारत ने
दो एक से अपने नाम की। सीरीज तो इंडिया
जीत गया मगर पाकिस्तान ने दूसरे टेस्ट में
ही अपनी तारीख की पहली फतह हासिल कर ली।
बीएसीसीपी के तहत ही पाकिस्तान क्रिकेट ने
परवाज़ शुरू की। कुछ ही दिनों में
पाकिस्तानी टीम का शुमार अच्छी क्रिकेट
टीम्स में होने लगा। 1955 में पाकिस्तान
ने न्यूजीलैंड के खिलाफ पहली दफा टेस्ट
सीरीज जीती। 80 की दहाई तक पाकिस्तानी टीम
बड़ी टीम बन चुकी थी। एक तरफ जावेद
मियादाद और जहीर अब्बास जैसे क्लासिक
बल्लेबाज स्कॉट में शामिल थे। और दूसरी
तरफ इमरान खान के उस्ताद सरफराज नवाज और
जादूगर की तरह गेंद को घुमाने वाले अब्दुल
कादिर और तौसीफ अहमद बॉलिंग अटैक का
हिस्सा थे। जरा एटीज के स्टैट्स पर एक नजर
डालते हैं। 1983 से 1990 के दरमियान 7 साल
में पाकिस्तान ने 18 टेस्ट सीरीज खेली और
जानते हैं जीत और हार का क्या तनासुब था।
पाकिस्तान को इन 18 सीरीज में से सिर्फ दो
में शिकस्त हुई। जबकि नौ टेस्ट सीरीज
पाकिस्तान ने जीती और बाकी ड्रॉ हो गई। इस
दौरान पाकिस्तान ने इंडिया से चार सीरीज
खेली और इंडिया एक भी नहीं जीत सका।
ऑस्ट्रेलिया से तीन टेस्ट सीरीज हुई
जिसमें से दो पाकिस्तान और एक ऑस्ट्रेलिया
जीता। यह पाकिस्तान क्रिकेट के गोल्डन डेज
थे। 1988 में पाकिस्तान क्रिकेट टीम टेस्ट
रैंकिंग में पहले नंबर पर पहुंच गई और
1992 में पाकिस्तान क्रिकेट ने वो कारनामा
किया जो इससे पहले यह बात कभी नहीं हो
सका।
इमरान खान की कयादत में पाकिस्तान ने पहला
और वाहिद वनडे वर्ल्ड कप जीता।
सवाल वही है कि मुल्क भी यही था, टैलेंट
भी यही था। अच्छा बुरा सिस्टम भी ऐसा ही
था जैसा पाकिस्तान में हमेशा होता है। फिर
क्या वजह है कि 92 के वर्ल्ड कप के
इब्तदाई मैचेस में शिकस्त के बाद कौमी टीम
कॉर्नर टाइगर बन गई थी। और आज वही टीम
छोटी टीमों के सामने भी बिल्ली बनी हुई
होती है। हमने इस डॉक्यूमेंट्री की तैयारी
के दौरान क्रिकेट बोर्ड के स्ट्रक्चर पर
नजर डाली तो एक चीज ने हमें हैरान किया और
वो यह है कि 1994 में क्रिकेट बोर्ड को
बकायदा प्रोफेशनल बनाने के लिए कुछ
तब्दीलियां हुई। बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर
क्रिकेट इन पाकिस्तान की जगह पीसीबी यानी
पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने ले ली।
अंदरूनी ढांचे में भी तब्दीलियां हुई और
इस बोर्ड को कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर के
मुताबिक ढाल दिया गया। हमने सोचा शायद यही
पाकिस्तान क्रिकेट के ज़वाल की वजह है। जब
तक कॉलोनियल सिस्टम था मामलात सही चल रहे
थे और जैसे ही हमने अपना स्ट्रक्चर और आइन
बनाया तो जुली का सफर शुरू हो गया। लेकिन
डाटा पर नजर डालें तो ऐसा नहीं है। यह बात
जरूर है कि पीसीबी जो कि एक खुद मुख्तार
इदारे के तौर पर सामने आया था जिससे
तवक्का थी कि वो सिस्टम में मौजूद लूप
पोल्स को खत्म करेगा। वो अपने इन तमाम
मकासिद में मुकम्मल तौर पर नाकाम हुआ।
लेकिन एज अ सिस्टम, स्ट्रक्चर और कल्चर,
बीसीसीपी और पीसीबी में कोई खास फर्क नहीं
है। पाकिस्तानी क्रिकेट के सवाल की असल
वजूहात कुछ और हैं। और इसकी पहली वजह वही
है जो मुल्क के ज़वाल की वजह है। यानी गैर
यकीनी सुरते हाल और गैर जरूरी मुदाखलत।
आपने यह सब पहले भी सुना होगा मगर आज हम
आपको डाटा के साथ आसान तरीके से समझाएंगे
कि इसका क्या मतलब है और इसने कैसे
क्रिकेट को मुतासिर किया। आइए जरा देखते
हैं कि पाकिस्तान की 80 की क्रिकेट और आज
की क्रिकेट में क्या फर्क है।
1980 से 1994 के दरमियान तकरीबन 15 साल
में चार मर्तबा क्रिकेट बोर्ड का चेयरमैन
तब्दील हुआ। इन चार में से तीन ने चार-चार
साल चेयरमैनशिप संभाली। यानी इन 15 सालों
में ऑन एवरेज एक चेयरमैन 3 साल तक बोर्ड
का हेड रहा। हमारी बदकिस्मती है कि हर
इदारे की तरह क्रिकेट भी कभी भी मुकम्मल
तौर पर सियासी मुदाखलत से आजाद नहीं हुई।
मगर एटीज में अगर कोई चेयरमैन सियासी
बुनियादों पर लगता भी था तो इसको अपनी टीम
और पॉलिसी चलाने के लिए मुनासिब वक्त
मिलता था। इस तसुल का असर ड्रेसिंग रूम और
फील्ड में भी नजर आता था। अब इन 15 सालों
के मुकाबले में पिछले 15 सालों के डाटा पर
एक नजर डालते हैं। 2010 से 2025 तक 12
मर्तबा पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के
चेयरमैन को तब्दील किया गया। सात मुख्तलिफ
अफराद सामने आए। इनमें से सिर्फ दो ने तीन
साल मुकम्मल किए और बाकी सब म्यूजिकिकल
चेयर की तरह कुछ दिनों, हफ्तों या महीनों
में तब्दील हो जाते। ऑन एवरेज इन 15 सालों
में एक चेयरमैन की मुद्दत सिर्फ सवा साल
है। अब सवा साल में चेयरमैन साहब अपने
तायनात करने वालों को खुश करेंगे। दोस्तों
का ख्याल करेंगे, अपनी टीम बनाएंगे,
पॉलिसी वजा करेंगे या इस इनसिक्योरिटी में
वक्त गुजार देंगे कि पता नहीं कौन किस
वक्त इनकी कुर्सी खींच ले और जब चेयरमैन
इतनी तेजी से तब्दील होते हैं, तो इनके
नीचे कोचेस का भी जुम्बा बाजार लगता है।
चलिए इनका भी डाटा देख लेते हैं। पिछले 10
सालों में पाकिस्तान क्रिकेट टीम के हेड
कोच को 10 मर्तबा तब्दील किया गया। 2016
में पाकिस्तान के हेड कोच मिक्की आर्थर
थे। इसके बाद मिसबाउल हक, फिर सकलन
मुश्ताक, फिर मोहम्मद हफीज। इसके बाद
अब्दुल रहमान, ब्रडबान, गैरी क्रिस्टन,
जसन गिलिस्पी, आकिब जावेद और अब माइक हसन
10 सालों में 10वें कोच हैं।
कोचेस की वजह से भी पाकिस्तान की कारकरदगी
डिटीरेट हो रही है। उसकी वजह यह है कि एक
कोच आता है वो अपने ट्रस्टेड प्लेयर्स को
लेकर आता है। फिर वो जाता है तो दूसरा कोच
आ जाता है। वो अपने लोगों को ले आता है।
म्यूजिकल चेयर गेम जारी है पाकिस्तान के
कोचेस में। बेशुमार अगर मैं नाम लेना शुरू
करूं एक तवील फहरिस्त है और अब आखिर में
सरफराज अहमद को इन्होंने बना दिया है। तो
इसका मतलब यह हुआ कि कोचेस में मुस्तकिल
मिजाजी की कमी है।
इन तब्दीलियों में कुछ तब्दीलियां बहुत
अजीब थी। अप्रैल 204 में पीसीबी ने वर्ल्ड
क्लास कोचेस जसन ग्लिस्पी और गैरी
क्रिस्टन के साथ मुयदा किया। मगर 2024
खत्म होने से पहले ही दोनों कोचेस तनाजात
के दरमियान इस्तीफा देकर रुखसत हो गए।
इसके पीछे क्या कहानी थी और हर फॉरेन कोच
के साथ ऐसा क्यों होता है? यह अब माजिद
भट्टी की जुबानी सुने। जसन गलेस्वी तो
अपने इंटरव्यूज में डायरेक्ट आकिब जावेद
का नाम लेते रहे। पाकिस्तान में जितने भी
फॉरेन कोचेस आए उनको पाकिस्तान क्रिकेट
बोर्ड के जो अफसरान हैं उनसे शिकवा रहा।
स्टीव रिकसन ऑस्ट्रेलिया के फॉर्मर
विकेटकीपर बैट्समैन थे जो पाकिस्तान के
फील्डिंग कोच थे। 2015 16 17 में दो-ती
साल रहे। अच्छे रिजल्ट प्रोड्यूस कर रही
थी। लेकिन स्टीव रिकसन ने क्या शिकायत की?
उन्होंने कहा कि मेरी सैलरी लेट हो रही
है। सैलरी ये नहीं कि क्रिकेट बोर्ड में
कोई फाइनेंसियल क्राइसिस था। पीसीबी के जो
अफसरान थे वो फॉरेनर्स को तंग करने के लिए
उनकी सैलरी में कोई ऐसे ही नुक्ता डाल
दिया कि भई अगर पहली को वो पैसे जाने उसके
अकाउंट में तो 12 14 को जा रहे हो। जाहिर
है गोरा है। उन मुल्कों में तो एक
सिस्टमैटिक काम होता है ना। तो हमने फॉरेन
कोचेस को लेकर आए लेकिन फिर हमने उनको
नाराज करके भेजा। यह गैर यकीनी कोचेस से
होते हुए कैप्टन की बार-बार तब्दीलियों तक
पहुंचती है और इसका असर टीम सिलेक्शन पर
भी होता है और ड्रेसिंग रूम के माहौल पर
भी। जहां सीनियर खिलाड़ी चाहते या ना
चाहते हुए कप्तानी के दौर में शामिल हो
जाते हैं और जूनियर को यह डर लगा रहता है
कि पता नहीं अगला मैच खेलने का मौका
मिलेगा भी या नहीं। यूं टीम स्प्रेड का
बेड़ा गर्क हो जाता है और पर्सनल
माइलस्टोनस टीम एफर्ट पर गालिब आ जाते
हैं। और यह मसला भी उन खिलाड़ियों के साथ
होता है जिनका फोकस परफॉर्मेंस पे हो। टीम
मैनेजमेंट में मुस्तकिल चेंजेस का यह असर
तो प्लेयर के लेवल पर है। लेकिन इन चेंजेस
के नतीजे में एक ऐसी तब्दीली भी आई जिसकी
वजह से पाकिस्तान में क्रिकेट के सिस्टम
को बहुत बड़ा झजका लगा।
डिपार्टमेंटल और रीजनल क्रिकेट की बहस को
समझने के लिए आपको डोमेस्टिक क्रिकेट को
समझना होगा। 1970 में अब्दुल हफीज कारदान
ने डिपार्टमेंटल क्रिकेट का आगाज किया। इस
सिस्टम के तहत पीआईएस, सुई गैस और नेशनल
ब्लैंक जैसे सरकारी इदारों की क्रिकेट
टीम्स बनाई गई। हर डिपार्टमेंट की टीम में
खेलने वाले क्रिकेटर को इन डिपार्टमेंट
में मुलाजमत भी दी जाती ताकि क्रिकेटर्स
को जॉब सेफ्टी भी मिले और इनके अच्छे
रोजगार का बंदोबस्त भी हो जाए। यह सिस्टम
ही पाकिस्तान की डोमेस्टिक क्रिकेट की रीड
की हड्डी था। हमारा हर क्रिकेटर इन्हीं
डिपार्टमेंट से खेलकर लाइमलाइट में आया
है। शोएब अख्तर पीआईए की टीम का हिस्सा
थे। सैयद अनवर यूबीएल की तरफ से खेलते थे।
यूनुस खान हबीब बैंक की नुमाइंदगी करते थे
और इसी तरह हर पुराना और नया प्लेयर
डिपार्टमेंटल क्रिकेट की पाइपलाइन से गुजर
कर ही कौमी टीम का हिस्सा बना। लेकिन
बोर्ड मैनेजमेंट में बार-बार तब्दीलियों
की वजह से यह सिस्टम भी हिचकोले खाता रहा।
कभी टीम्स की तादाद 26 तक बढ़ा दी जाती और
कभी कम करके सिर्फ आठ टीम्स तक महदूद कर
दिया जाता। कभी रीजंस को शामिल किया जाता
और कभी निकाल दिया जाता।
आज तक पाकिस्तान क्रिकेट में हम ये सिस्टम
नहीं बना सके कि कायदे आजम ट्रॉफी
डिपार्टमेंट्स की टीमें पार्टिसिपेट
करेंगी या रीजंस की टीमें पार्टिसिपेट
करेंगी, सिटी की टीमें पार्टिसिपेट करेंगी
या प्रोविंस की टीमें पार्टिसिपेट करेंगी।
कोई साहब आते हैं वो कहते हैं कि जी हम
ऑस्ट्रेलियन सिस्टम ले आए हैं। छह टीमों
का टूर्नामेंट होगा। तो ठीक है। छह टीमों
का अगर आपने टूर्नामेंट किया भी है तो
सिस्टम को टाइम तो दें। ओवरनाइट तो कोई
रिजल्ट प्रोड्यूस नहीं कर सकता। पड़ोस में
इंडिया ऑर्गेनाइज सिस्टम बनाया हुआ है।
प्रोफेशनल सिस्टम बनाया हुआ है।
2018 में इमरान खान वज़र आजम बने तो
उन्होंने इस पूरे निजाम का बोरिया बिस्तर
गोल्ड कर दिया। इमरान खान ने एहसान मानी
को पीसीबी का चेयरमैन बनाया जिन्होंने
डिपार्टमेंटल क्रिकेट का मुकम्मल खात्मा
कर दिया। किसी महकमे की कोई टीम नहीं रही।
इसके बजाय इन्होंने रीजंस यानी सूबों की
टीमें बनाई और क्रिकेट बोर्ड के नए आइन के
मुताबिक नया सिस्टम चलाया।
क्योंकि इमरान खान प्राइम मिनिस्टर भाई
आपने खुद ये खेली है। तुमने इंग्लैंड में
काउंट नहीं खेली। आज काउंट में पैसा नहीं
मिलता। हम पागल के बच्चे थे वहां खेल के
जाके।
ये क्रिकेट के निजाम को इतना बड़ा धजका था
कि इससे सैकड़ों क्रिकेटर्स बेरोजगार हो
गए। मगर इस सिस्टम के हामियों के पास भी
अपने दलाइल है।
वो डोमेस्टिक सिस्टम इनफोर्स करवाया गया।
उसके बाद फिर एहसान मानी को एस चेयरमैन
लाया गया। उनके साथ वसीम खान सीईओ थे। फिर
रमीज राजा जो पाकिस्तान के साबिक टेस्ट
क्रिकेटर हैं वो चेयरमैन बने। उस वक्त भी
खान साहब का बनाया हुआ ये क्योंकि उनकी
अपनी पर्सनल ख्वाहिश ख्वाहिश थी है। उस
सिस्टम में क्रिकेटर्स बहुत ज्यादा शिकायत
करते हुए नजर आते थे। उसकी वजह यह है कि
जो इस वक्त डोमेस्टिक का सिस्टम है उसमें
क्रिकेटर्स के पास अपॉर्चुनिटीज ज्यादा थी
मैचेस खेलने की। तो जब खान साहब ने वो
इंट्रोड्यूस करवाया तो लड़कों की जॉब्स
चली गई। जाहिर है सिक्योरिटी का मसला हुआ,
जॉब सिक्योरिटी का मसला हुआ। फिर बहुत
सारे डिपार्टमेंट्स का नुकसान हुआ जिसकी
वजह से डिपार्टमेंट्स ने अपने जो क्रिकेट
टीम्स थी उनको बंद कर दिया।
इशू यह नहीं है कि डिपार्टमेंटल क्रिकेट
का सिस्टम अच्छा था या रीजनल क्रिकेट
ज्यादा बेहतर है। दोनों सिस्टम के प्रोज़
एंड क्स हैं। मगर मसला यह है कि किसी भी
सिस्टम को तसलसुल के साथ नहीं चलाया जाता।
किसी बड़े दफ्तर में किसी बड़े साहब का
अचानक मूड चेंज हो जाता है। वजीर आजम
तब्दील होता है तो नया वजीर आजम नया बोर्ड
का चेयरमैन लगा देता है और वह चेयरमैन नया
निजाम लेकर आ जाता है। अभी वो निजाम अपने
पैरों पर खड़े होकर दो कदम चलता ही है कि
फिर किसी बड़े साहब का मूड दोबारा चेंज हो
जाता है और सब कुछ नए सिरे से शुरू हो
जाता है। इमरान खान के रीजनल क्रिकेट
सिस्टम के साथ भी यही हुआ। जैसे ही इनकी
वज़ारत उज्मा खत्म होने के बाद नजम सेठी
पीसीबी चेयरमैन बने। उन्होंने सबसे पहले
डिपार्टमेंट्स वापस बहाल कर दिए। जब ऊपर
से नीचे तक निजाम में इतनी इनसिक्योरिटी
होगी और प्लेयर्स बनाने वाली फैक्ट्री
यानी डोमेस्टिक ऑफ फर्स्ट क्लास क्रिकेट
में ही गैर यकीनी होगी तो इसका नतीजा वही
बौखलाए हुए खिलाड़ी होंगे जो हमें नजर आते
हैं। वैसे क्रिकेट बोर्ड में मुस्तकिल
चेंजेस को एक और फैक्टर मजीद तबाकुल बना
देता है और वह नए बनने वाले चेयरमैन का
कैलिबर है। चलिए जरा थीम मोड चेंज करते
हैं और आपको 1999 में ले जाते हैं।
12 अक्टूबर को जनरल मुशर्रफ ने जब जमूरियत
की बिसात को लपेटा तो उसके 2 महीने बाद
दिसंबर 1999 में क्रिकेट बोर्ड का चेयरमैन
भी तब्दील कर दिया। पहली दफा बावर्दी जनरल
ने पीसीबी का चार्ज संभाला। कोर कमांडर
मंगला जनरल तौकीर जिया चेयरमैन पीसीबी बन
गए। हम मोहसन नकवी के दोहरे ओहदों पर
हैरान होते हैं। मगर यह रिवायत बहुत
पुरानी है। खैर, तौकीर जिया ने नवाज शरीफ
के लगाए हुए जिस चेयरमैन को रिप्लेस किया
था, वह भी कप्तानों की अचानक तब्दीली से
बोर्ड के 50 साला पुराने लोगों की तब्दीली
पर बेवख़्त और बेजूरत तब्दीली के लिए
मशहूर थे। जनरल साहब ने ओहदा संभाला तो
कुछ चीजें बेहतर की। मगर वक्त के साथ ऐसे
इदामात उठाए कि रोजनामा डॉन ने इनके दौर
को पाकिस्तान क्रिकेट का तारीख तरीन दौर
करार दिया। इसकी एक वजह और मिसाल यह थी कि
चेयरमैन साहब के अपने बेटे ने फर्स्ट
क्लास क्रिकेट में दिन दुगनी रात दुगनी
तरक्की की और बॉलिंग एक्शन मशकूक होने के
बावजूद कौमी टीम का हिस्सा बन गया।
पाकिस्तान के सिफारिशी कल्चर में भी
नेपोटिज्म की ऐसी मिसाल मिलना मुश्किल है।
यह कहानी सुनाने का मकसद यह है कि सियासी
मुदाखलत का यह मसला तो है ही, लेकिन
सियासी मुदाखलत की बुनियाद पर किस कैलिबर
और काबिलियत के शख्स को चेयरमैन बनाया जा
रहा है। इससे भी काफी फर्क पड़ता है। खैर,
पाकिस्तान क्रिकेट के सवाल की वजूहात की
तरफ वापस आते हैं। अपने उसी सवाल की तरफ
कि 80 में दुनिया पर राज करने वाली
क्रिकेट टीम आज बांग्लादेश जैसी टीम के
सामने भी क्यों ढेर हो जाती है?
परफॉर्मेंस में तसल्लसुल ना होने पर तो
हमने तफसीली बात कर ली। लेकिन एक और वजह
भी है और वो है एक्सपोज़र की कमी।
हमने आपको कुछ देर पहले 80 और आज के
चेयरमैन की मुद्दत में फर्क बताया था। अब
एक और फर्क भी देखिए। 80 में पाकिस्तान
क्रिकेट के तमाम बड़े नाम इंग्लिश काउंट
क्रिकेट खेलते थे। 70 और 80 की इंग्लिश
काउंटी को आप आज का आईपीएल समझ लें। बस
फर्क यह है कि इंग्लिश काउंट के मैचेस तीन
या चार रोजा होते थे। T20 की तेजी इनके
अंदर नहीं थी। 60ज में पाकिस्तान क्रिकेट
का बुरा हाल था। टीम कमजोर हो रही थी। जीत
का रेश्यो कम था और फिर 70ज में पाकिस्तान
प्लेयर्स ने बड़ी तादाद में इंग्लिश काउंट
का रुख किया। उस जमाने के तकरीबन सारे ही
बड़े नाम इंग्लिश काउंट का हिस्सा थे।
जहीर अब्बास ग्लस्टर शायर का हिस्सा थे।
इमरान खान ससेक्स की नुमाइंदगी करते थे।
जावेद मियाद गिलम्ॉर्गन, सरफराज नवाब
नथंटन शायर और वसीम अकरम लंका शायर की तरफ
से खेलते थे। इंग्लिश काउंटज का
पाकिस्तानी प्लेयर्स को पॉलिश करने में
इतना बड़ा किरदार था कि इमरान खान खुद
कहते हैं कि मैंने बुनियादी क्रिकेट
ससेक्स काउंट के जॉन स्नो से सीखी और उनके
साथी जावेद मियादाद का भी यही ख्याल है कि
अगर इंग्लिश क्रिकेट ना होती तो इमरान खान
कभी वो खिलाड़ी ना बन पाते जो वो बने।
कुछ वक्त के बाद इंग्लिश काउंटज ने फॉरेन
प्लेयर्स के साथ तवीलर मोएदे खत्म कर दिए।
यूं पाकिस्तानी प्लेयर्स के लिए भी यह
दरवाजा बंद हो गया। हमने इस डॉक्यूमेंट्री
की तैयारी के दौरान चेक किया कि पाकिस्तान
की फर्स्ट क्लास टीम पाकिस्तान शाहीं ने
2025 के दौरान कितने और किसके साथ मैचेस
खेले और फिर हमने इसका तकाबुल हिंदुस्तानी
क्रिकेट टीम से किया। 2025 के दौरान
पाकिस्तान शाहीं ने सिर्फ तीन टेस्ट मैचेस
खेले। पूरे साल में तीन टेस्ट मैचेस और
इनमें से दो किसी गैर मारूफ क्लब टीम के
खिलाफ खेले। सिर्फ एक टेस्ट वेस्ट इंडीज
की ए टीम के खिलाफ खेला है। इसके मुकाबले
में इंडिया की ए टीम ने 2025 में छह टेस्ट
मैचेस खेले। यानी पाकिस्तान से डबल। और
ज्यादा अहम बात यह है कि इंडिया ने तमाम
मैचेस इंग्लैंड, साउथ अफ्रीका और
ऑस्ट्रेलिया की ए टीम के साथ खेले हैं।
यही हाल वनडे का भी है। पाकिस्तान के
अक्सर मैचेस बांग्लादेश और अफगानिस्तान
वगैरह के साथ थे। जबकि इंडिया का मुकाबला
इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों से
हुआ। यही एक्सपोज़र और स्किल का फर्क है जो
आपको पाकिस्तानी और इंडियन प्लेयर्स में
नजर आता है। इंडियन प्लेयर इंटरनेशनल लेवल
की क्रिकेट खेलकर टीम में आता है तो इसका
कॉन्फिडेंस और स्किल का मयार बिल्कुल ही
अलग होता है। जबकि पाकिस्तानी क्रिकेटर
बेचारा मैदान में उतर कर ही सीखता है कि
इस प्रेशर को कैसे हैंडल करना है। वैसे ये
एक्सपोज़र ना मिलने में हमारे सीनियर
स्पिनर्स की भी गलती है। आपका मसला यह था
कि आप अगर ए टीम आ रही है किसी अ मुल्क की
आप उसके खिलाफ भी अपने मेन प्लेयर्स को
खिला रहे थे। अगर वो अपनी सी स्ट्रेंथ
साइड भेज रही थी ड्यू टू लीग शेड्यूल या
फॉर वन रीजन और अनदर तब भी आपके मेन
खिलाड़ी खेल रहे तो वो पर्सनली तो ग्रो कर
रहे थे लेकिन पाकिस्तान टीम का जो बैकअप
था वो उस तरीके से नहीं बन पा रहा था
इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया या इवन इंडिया भी
देखेंगे वो जो गैर अहम सीरीज होती हैं वो
अपने जूनियर प्लेयर्स को भेजते हैं बाहर
कि आप जाइए वहां पे जाके अगर किसी ने
जिंबाब्वे जाना है वेस्ट इंडीज जाना है
बांग्लादेश जाना है वो सारे सीनियर
प्लेयर्स को रेस्ट करा के एक नए प्लेयर्स
को मौका देते हैं ताकि उनको इंटरनेशनल
एक्सपोज़र मिले। हमारे यहां ऐसा बदकिस्मती
से नहीं होता जिसकी वजह से अचानक प्लेयर्स
आते हैं। 204 में इंडिया ने T20 वर्ल्ड कप
से पहले ही यह इस बात को यकीनी बनाया है।
अपने न्यूज़ पर चलाया हर जगह चलाया कि
चाहे हम जीतें या हारे रोहित शर्मा और
विराट कोहली रिटायर हो जाएंगे। यह
माइंडसेट उनका पहले से ही था। उसकी वजह यह
है कि जब उनके यहां पर बीसी टीम्स आती थी,
वह अपने शुभमन गिल को ट्राई करते थे। वह
अभिषेक शर्मा को ट्राई करते थे। वो ईशान
किशन को ट्राई करते थे वो सूर्य कुमार
यादव को ट्राई करते थे। अब अगर आप अजान
अवेज की या किसी मा सदागत की बात करते
हैं, आप उनको साथ-साथ लेके चलेंगे और गैर
अहम जो सीरीज है या लाइक जिंबाब्वे हो गई
या वेस्ट इंडीज हो गई उसमें आप साथ-साथ
मौका देंगे, सीखते रहेंगे वो। लेकिन हमारे
यहां क्या होता है अचानक वर्ल्ड कप में
प्लेयर को ले आते हैं। अचानक जो है वो
किसी बड़ी सीरीज में प्लेयर को मैदान में
उतार देते हैं। जिसकी वजह से वो एक्सपोज
हो जाते हैं। तो आज देख लें विराट कोहली
गया तो इंडियन टीम को टी20 में कोई मसला
नहीं हुआ। वो दूसरा वर्ल्ड कप जीत गए।
हमारे यहां रेस्ट का कल्चर को यह समझा गया
था कि शायद अगर मेरे बाद कोई प्लेयर आएगा
परफॉर्म करने तो मेरी जगह ले लेगा। इन
सारी बातों का मतलब यह है कि कॉमी टीम में
आने वाले खिलाड़ी पीएसएल के अलावा सिर्फ
पाकिस्तान का डोमेस्टिक क्रिकेट ही खेलते
हैं। चले इसकी भी कुछ बात कर लेते हैं।
या
डोमेस्टिक क्रिकेट के मसाइल को समझने के
लिए पहले तो एक बात ज़हन में रख लें कि जब
क्रिकेट बोर्ड में तब्दीली की वजह से
कोचिंग स्टाफ, सिलेक्टर्स और कैप्टन
तब्दील होते हैं तो इसका असर नीचे भी आता
है। और कौमी टीम के मामलात तो फिर भी
मीडिया में हाईलाइट हो जाते हैं। इलाकाई
टीमों के मसाइल मीडिया में नहीं आते।
इसलिए वहां सारे स्टेक होल्डर्स की मनमानी
भी ज्यादा होती है। आप कराची क्रिकेट
एसोसिएशन की मिसाल ही ले लें। कुछ सालों
पहले Jio सुपर ने रिपोर्ट किया था कि
कराची में सात ज़ों्स की टीमें हैं। मगर
पाकिस्तान क्रिकेट टीम में जाने का सबसे
आसान और मुख्तसर रास्ता ज़ोन सिक्स टीम में
शामिल होता है। क्योंकि ज़ोन सिक्स के
कर्ताधर्ता एक पीएसएल टीम के मालिक हैं।
वो अपने ज़ोन के खिलाड़ियों को ही पीएसएल की
टीम में शामिल करते हैं और वहां से
लाइमलाइट में आना और सिलेक्टर्स की तवज्जो
हासिल करना आसान होता है। अभी कुछ महीने
पहले ही कराची रीजन क्रिकेट एसोसिएशन में
बाहमी इख्तलाफात की वजह से एसोसिएशन के
सेक्रेटरी जावेद अहमद खान को अदम एतमाद के
वोट के जरिए ओदे से हटा दिया गया। यह एक
रीजनल क्रिकेट में होने वाली पॉलिटिक्स
है। ऐसा कैसे हो सकता है कि इन डर्टी
गेम्स का असर प्लेयर्स के गेम पर ना पड़े।
लेकिन इन मसाइल के अलावा भी डोमेस्टिक
क्रिकेट में कई इशूज़ हैं। पाकिस्तान की
डोमेस्टिक क्रिकेट का सबसे अहम टूर्नामेंट
कायदे आजम ट्रॉफी है। इसी तरह इंडियन
डोमेस्टिक क्रिकेट का सबसे अहम टूर्नामेंट
राझी ट्रॉफी है। मैंने क्रिक इनफो पर इन
दोनों टूर्नामेंट्स के आखिरी सेशन के
मैचेस पर नजर डाली तो एक अजीब चीज नजर आई।
कायदेआज़म ट्रॉफी के फाइनल के अलावा सारे
मैचेस रावलपिंडी, पेशावर, ऐपटाबाद और
इस्लामाबाद में खेले गए। यानी चार
स्टेडियम्स में जिनमें से तीन स्टेडियम्स
में इंटरनेशनल मैचेस नहीं होते। अब मैंने
रांची ट्रॉफी के स्टेडियम देखना शुरू किए
तो मुख्तलिफ नाम लिखते-लिखते मेरे हाथ थक
गए। मगर नाम खत्म नहीं हुए। इससे फर्क
क्या पड़ता है? फर्क यह पड़ता है कि
इंडियन प्लेयर्स को मुख्तलिफ पिचेस और
मुख्तलिफ कंडीशंस पर खेलने का मौका मिलता
है। जिससे इनकी इंटरनेशनल क्रिकेट की
तैयारी बेहतर होती है। जबकि पाकिस्तानी
प्लेयर्स एक ही कंडीशन के आदि हो जाते
हैं। और जैसे ही पिच बदलती है हमारे
खिलाड़ियों की कांपे टांग जाती हैं।
रंजी ट्रॉफी अगर देखो ना इंडिया में तो
वहां पे 10-12 ग्राउंड्स में हो रही है।
डिफरेंट पिचेस हैं। आपको कहीं पे स्पिन
सपोर्टिंग विकेट मिलेगी, कहीं पे फास्ट
बॉलिंग सपोर्टिंग विकेट मिलेगी, कहीं पे
बैट एंड बॉल में बैलेंस होगा। हर तरह से
यही इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया में भी है। इसी
तरीके का हमारे यहां क्या होता है? हमारे
यहां डोमेस्टिक में आप देखें रंस के अंबार
लगा देते हैं लड़के। चार-चार पांच-प
प्लेयर्स जो है वो एक-एक डेढ़-डेढ़ हज़ार
रंस कर रहे होते हैं एक सीजन के अंदर।
मसला यह है कि दो-तीन ग्राउंड्स पे पूरी
की पूरी कायदेआज़म ट्रॉफी हो रही है। पूरा
आपका डोमेस्टिक वन डे कप हो रहा है। वही
प्लेयर्स जब आप लाते हैं अपनी टीम के अंदर
और आप उनको इंग्लैंड ले जाते हैं। आप उनको
ऑस्ट्रेलिया ले जाते हैं तो वो तो हैरान
रह जाते हैं भाई ऐसी भी पिचेस होती हैं।
टूर करा रहे हैं अगर यूएई का टूर करा रहे
हैं। अगर बांग्लादेश का इसका कोई फायदा
नहीं है। आप उनको ऑस्ट्रेलिया,
न्यूजीलैंड, वेस्ट इंडीज, साउथ अफ्रीका
ऐसे जब तक टूअर नहीं होंगे प्लेयर्स आपका
वहां पे जाके बाउंसी कंडीशंस में,
क्लाउडडी कंडीशंस में बॉल जब हिल रहा होता
है उस कंडीशंस में खेलेगा तब जाके उसकी
स्किल जो है वो डेवलप होंगी। वरना आप यूएई
में अभी इंग्लैंड लाइंस शायद आए थे
पाकिस्तान शाहीन से खेलने। उसका कोई फायदा
नहीं है। वो सिमिलर कंडीशन है।
एक और मसला यह है कि हमारे सीनियर प्लेयर
फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलने के पाबंद नहीं
है।
डोमेस्टिक क्रिकेट का एक सबसे बड़ी खामी
ये है कि हमारे स्टार क्रिकेटर्स
डोमेस्टिक क्रिकेट नहीं खेलते। जब तक
स्टार क्रिकेटर्स नौजवानों के साथ
ड्रेसिंग रूम शेयर नहीं करेंगे उस वक्त तक
मोटिवे मोटिवेशन पैदा नहीं होगी। उसकी एक
और वजह ये है कि डोमेस्टिक क्रिकेट का
मयार बहुत ही घिरा हुआ है। एक तो भारत में
जिस तरह आपने राझी ट्रॉफी की बात की राझी
ट्रॉफी होती है। धुली ट्रॉफी होती है और
वहां प्लेयर्स के लिए जो इंटरनेशनल
क्रिकेटर्स भी उनके लिए डोमेस्टिक क्रिकेट
खेलना लाजमी है। इवन विराट कोहली ने
डोमेस्टिक क्रिकेट खेली। हमारे यहां बाबर
आजम कहते हैं मैं आराम कर रहा हूं। मतलब
कानून नहीं है ना कि आप किसी के लिए कानून
बनाया कि भाई आपने डोमेस्टिक क्रिकेट
खेलेंगे तो पाकिस्तानी टीम में खेलेंगे
आप। विराट कोहली भी जब टीम से ड्रॉप हुए
तो उनको रझी ट्रॉफी कई सालों के बाद खेलना
पड़ी। आप देखें आप चेक कर लें कि बाबर आजम
आखिरी बार कब फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेले।
वो फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलते ही नहीं
है। फिर प्लेयर को ग्रूम करने के लिए एक
तो ये डोमेस्टिक क्रिकेट है कि भाई आप
उनको फर्स्ट क्लास क्रिकेट में भेजें। हर
बंदा चाहता है मैं पीएसएल खेलूं। यहां
पैसा ज्यादा है। छोटा फॉर्मेट है। चार ओवर
बॉलिंग करानी है। बैटिंग में भी आपको 30
35 40 बॉलें खेल कर आउट होकर चले जाना है।
अवल तो फर्स्ट क्लास क्रिकेट इन तमाम
मसाइल्स का शिकार रहती है। और फिर जब यहां
से कौमी टीम के लिए खिलाड़ियों को सेलेक्ट
करने का वक्त आता है तो इसमें भी कई मसाइल
होते हैं। ऐसा लगता है कि कौमी क्रिकेट
टीम में शामिल करने का कोई क्राइटेरिया ही
नहीं है।
रूटवूड कुछ भी नहीं है। ऑनेस्टली अगर मैं
बताऊं अनफॉर्चूनेटली ये सारा प्रेशर गेम
है। ये जो जितने सिलेक्टर्स आ रहे हैं
अनफॉर्चूनेटली इनमें प्रेशर हैंडलिंग की
सलाहियत ही नहीं है। सोशल मीडिया पर जो
ट्रेंड कर रहा है जिसको फैंस कह दें कि
भाई ये तो बहुत ही अच्छा प्लेयर है। इसको
टीम में शामिल करें। चार पांच फ्रेंड चल
गए उसके ऊपर उसने टीमें हायर की हुई है।
वो बंदा टीम में आ जाता है। लास्ट जो
अच्छा चीफ सिलेक्टर आया था ना आपका शायद
बहुत सारे लोग मेरी बात से इत्तेफाक ना
करें। मोहम्मद वसीम थे वो जिन्होंने
टेक्निकल बुनियादों पर सिलेक्शन की है। उन
प्लेयर्स की सिलेक्शन की है जिन्होंने
पूरे डोमेस्टिक में रगड़े खाए हुए हैं।
पाकिस्तान क्रिकेट के इन तमाम मसाइल पर
हमने जिससे भी बात की उसने खुलकर मसाइल की
निशानानदेही की। मगर जैसे ही मौजूदा
क्रिकेट बोर्ड की बात करते तो आवाज धीमी
हो जाती। घन गरज सरगोशियों में तब्दील हो
जाती। माथे पर शिकन आ जाती और चेहरे पर
पसीना आने लगता। हमने सोचा मीडिया तो उस
वक्त भी क्रिकेट बोर्ड पर तनकीद करता था
जब इसका चेयरमैन एक सर्विंग आर्मी जनरल
था। बल्कि उसे ओदे से हटाने में मीडिया का
अहम रोल था। तो अब क्रिकेट बोर्ड ऐसी
मुकद्दस गाय क्यों बन गया है कि लोग इसके
मुतालिक बात करने से डरते हैं। इस बारे
में लोगों ने हमें जो बातें बताई वो कम से
कम हमारे लिए तो नाकाबिल यकीन है।
उन्होंने बताया कि 204 के बाद से क्रिकेट
बोर्ड को प्रोफेशनल्स नहीं मनपसंद
ब्यूरोक्रेट चला रहे हैं। इर्तजा कुमैल
एसपी मॉडल टाउन थे। वो आज पाकिस्तान
क्रिकेट टीम के मैनेजर हैं। रफिया हैदर
डिप्टी कमिश्नर लाहौर थी। वो आज पीसीबी
वुमेन विंग की हेड हैं। वज़र आजम हाउस के
जॉइंट सेक्रेटरी समीर अहमद सैयद को पीसीबी
का चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर तायनात कर दिया गया
है। खतरनाक बात यह नहीं है कि क्रिकेट का
निजाम वो ब्यूरोक्रेट चला रहे हैं जिनका
स्पोर्ट्स या क्रिकेट से कोई ताल्लुक
नहीं। खतरनाक बात यह है कि सोशल मीडिया पर
यह खबरें गरम है कि साबिक क्रिकेटर्स हो
या स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट। क्रिकेट बोर्ड पर
जो भी तनकीद करता है तो वज़ारते दाखला का
मातहत एफआईए इसके खिलाफ इंक्वायरी खोल
देता है। इसलिए अब लोग क्रिकेट बोर्ड के
खिलाफ भी बात करते हुए घबराते हैं।
आखिर में ऐसा तो नहीं हो सकता कि
पाकिस्तान क्रिकेट की बात हो और पीएसएल की
बात ना हो। इसमें कोई शक नहीं कि
पाकिस्तान सुपर लीग शुरू होने से मुल्क
में क्रिकेट की रौनकें वापस आई हैं।
इंटरनेशनल क्रिकेटर्स कई साल बाद पीएसएल
के प्लेटफार्म से पाकिस्तान आए। फर्स्ट
क्लास क्रिकेटर्स को पहली दफा तवज्जो और
शोहरत मिली और नया टैलेंट सामने आया लेकिन
पीएसएल ने कौमी टीम में सिलेक्शन के
क्राइटेरिया पर मनफी असर भी डाला। अभी जो
लास्ट टू थ्री इयर्स में जिस तरह मैंने
आपको पहले कहा है कि कैप्स का जुम्बा
बाजार लगा हुआ है दिए जा रहे हैं। पीएसएल
की एक दो इनिंग्स आई अच्छी खेली आपने उसको
ला के खड़ा कर दिया इंटरनेशनल क्रिकेट पे।
भाई पीएसएल का प्रेशर और इंटरनेशनल का
प्रेशर पीएसएल की बॉलिंग और इंटरनेशनल की
बॉलिंग में जमीन आसमान का फर्क है।
पीएसएल का जिक्र हो रहा था तो हमने मिर्जा
इकबाल बेग साहब से पूछा कि पीएसएल की
रंगारंगा तकरीबात किसके खर्चे पर होती है
और इसके ऑडिट का कोई सिस्टम है? तो
उन्होंने ये जवाब दिया।
जो लोग हैं वो यस सर कहने वाले हैं। एक
स्टोरी छपी थी डॉन में कुछ अरसा पहले
जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान क्रिकेट
बोर्ड का बजट जो था वो 10-15 मिनट में
अप्रूव हो गया। बजाय किसी डिस्कशन के। तो
आप इससे अंदाजा लगा लें कि मतलब वही वाली
बात है जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला हिसाब
है। अगर आप मतलब कोई बोलने वाला नहीं है
ना कोई बोलेगा कैसे? खर्चा भी कर रहे हैं।
सब कुछ हो रहा है। लेकिन रिजल्ट क्या आ
रहा है? आप ये भी देखें सिवाय पीएसएल के
आप जो कह रहे हैं और क्या रिजल्ट आ रहा है
हमें बता दें कि पाकिस्तान के कायज़म
ट्रॉफी का फाइनल देखने के लिए लोग खचाखचा
तमाशाई आए हुए हो। ग्राउंड्स की क्या
सुरते हाल है। दो स्टेडियम अभी तक टूटे
हुए हैं। उनकी छत नहीं डली। गदाफी
स्टेडियम लाहौर की नेशनल स्टेडियम कराची
की। तो पाकिस्तान में बहुत सारी ऐसी चीजें
हो रही हैं फाइनेंससेस के हवाले से कि चेक
एंड बैलेंस नहीं है।
पाकिस्तानी माशरे में आज कई इख्तलाफात है।
हर छोटा बड़ा इशू मजहबी और सियासी
पोलराइजेशन का शिकार है। मगर एक आध चीज
ऐसी है जिस पर तमाम पाकिस्तानी मुत्तफिक
होते हैं। पाकिस्तान के लेजेंडरी कमेंटेटर
उमर कुरैशी के नजदीक क्रिकेट वो चीज है जो
पूरे पाकिस्तान को जोड़ने की सलाहियत रखती
है। यह महज एक खेल नहीं कौमी हम आंगी का
प्लेटफार्म है। कोटा से लेकर लाहौर तक और
सखर से लेकर गिलगित तक। हर पाकिस्तानी
क्रिकेट देखता है। कौमी टीम को सपोर्ट
करता है। इसकी जीत पर जश्न मनाता है और
हार पर अफसरदा हो जाता है। मगर इसकी हालत
भी वही है जो कौमी सियासत की हालत है।
पिछले 30 सालों में पीसीबी का आइन पांच
दफा तब्दील हो चुका है। यानी इन अदर
वर्ड्स आइन का एतराम खत्म हो चुका है। जो
भी आता है वह अपनी मर्जी का आइन और सिस्टम
बनाता है और उसके जाने के साथ उसका सिस्टम
भी खत्म हो जाता है। यह सिलसिला कई सालों
से चल रहा है। मगर अब हमें इसके असरात भी
नजर आ रहे हैं। पाकिस्तान क्रिकेट
पाकिस्तान हॉकी बनता जा रहा है। अगर खुदा
ना खास्ता ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक खेल
का सवाल नहीं होगा बल्कि कौमी यकजती की
अलामत का खात्मा होगा। फिर कोई एफआईए का
नोटिस या धमकी इस यजती को रिवाइव नहीं कर
पाएगी।
स्पॉट
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यह वीडियो पाकिस्तानी क्रिकेट के लगातार गिरते प्रदर्शन और उसकी गहराती जड़ों के कारणों का एक विस्तृत विश्लेषण है। इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे राजनीतिक हस्तक्षेप, पीसीबी में निरंतर नेतृत्व परिवर्तन, डोमेस्टिक क्रिकेट संरचना में बार-बार बदलाव और खिलाड़ियों की सही एक्सपोजर न मिल पाने के कारण पाकिस्तान टीम अपनी प्रतिष्ठा खो रही है। वीडियो इस बात पर जोर देता है कि क्रिकेट, जो कभी पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोता था, अब खुद कुप्रबंधन और इनसिक्योरिटी का शिकार हो गया है।
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