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Long Before Hasan Raheem, Atif Aslam Junaid Jamshed & Coke Studio | We Had Alamgir

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Long Before Hasan Raheem, Atif Aslam Junaid Jamshed & Coke Studio | We Had Alamgir

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598 segments

0:02

यह तारिक रोड है। जिस जगह को आप देख रहे

0:04

हैं, यहां कई दहाइयों पहले एक कैफे डी खान

0:07

हुआ करता था। 60ज और 70ज में बाहर खाने का

0:10

ट्रेंड कम था और रेस्टोरेंट्स उससे भी कम।

0:13

यही वजह थी कि पूरे शहर से लोग यहां खाना

0:15

खाने और चाय पीने आया करते थे। वैसे तो

0:17

यहां के सारे खाने ही अच्छे थे। लेकिन

0:19

ब्रेन मसाला और चिकन टिक्का तो बहुत ही

0:21

फेमस थे। कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि

0:23

कराची में चिकन टिक्का इंट्रोड्यूस ही

0:25

कैफेडी खान ने करवाया। लेकिन लोगों के

0:28

यहां आने की एक और वजह भी थी और वह था

0:30

यहां का म्यूजिक। [संगीत] यहां पर रात को

0:32

7:00 बजे के बाद एक धानपान सा लड़का गिटार

0:35

बजाता था। साथ ही कुछ गाने भी गुनगुनाता

0:37

था। उस लड़की की आवाज में ऐसा जादू था कि

0:40

वो घंटों खाना [संगीत] खाते रहते।

0:45

सान बांग्लादेश पर हम बहुत सी

0:47

डॉक्यूमेंट्रीज बना चुके हैं। इस जमाने को

0:49

हमारी हिस्ट्री का सबसे डिप्रेसिंग दौर

0:51

कहा जा सकता है। ना सिर्फ कायद का

0:53

पाकिस्तान टूट चुका था बल्कि हमारे 70

0:55

हजार से जायद पाकिस्तानी भी दुश्मन की कैद

0:58

में थे। हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा मायूसी

1:01

ही मायूसी थी। लेकिन बिल्कुल उसी जमाने

1:03

में एक और बहुत ही इंटरेस्टिंग डेवलपमेंट

1:05

हो रही थी। पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री

1:07

वाज़ बोमिंग। सिर्फ 71 में 80 और 72 में 98

1:11

फिल्में रिलीज़ हुई। बहारो फूल बरसाओ। मेरी

1:14

जिंदगी है नगमा जैसी ब्लॉकबस्टर सब उसी

1:17

जमाने की फिल्में हैं। मोहम्मद अली जेबा,

1:19

वहीद मुराद, संगीता और नदीम शबनम के स्टार

1:22

कपल्स एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में दे

1:25

रहे थे। बेहतरीन म्यूजिक और एक्टिंग के

1:27

कॉम्बिनेशन ने लोगों को दीवाना बना दिया

1:30

था। सिनेमाज़ हाउसफुल जा रहे थे। फिल्म

1:32

इंडस्ट्री की देखादेखी PTV पर भी जबरदस्त

1:35

नए प्रोग्राम्स शुरू किए जा चुके थे।

1:36

जियामुद्दीन का शो अपने उरूज पर था। मतलब

1:39

क्या आप इमेजिन कर सकते हैं कि PTV पर

1:41

शेक्सपियर के ड्रामे सुनाए जाते थे। सुहेल

1:44

राणा बच्चों को म्यूजिक की एबीसी सिखा रहे

1:46

थे और खुशबख्त आलिया फिरोजा की शक्ल में

1:49

पाकिस्तान गॉड टैलेंट टॉप का शो कर रही

1:52

थी। जिसमें वो नए और छुपे हुए सिंगर्स और

1:54

म्यूजिशियंस को सामने ला रही थी।

1:56

पाकिस्तान टेलीविज़न को तलाश थी एक ऐसे

1:58

चेहरे की जो घर बैठे नाज़रीन को वही वाइब्स

2:01

दे जो सिनेमा में नदीम, मोहम्मद अली और

2:03

वहीद मुराद को देखकर आती थी। कोई ऐसी आवाज

2:06

हो कि लोगों के दिमाग में छा जाए। अहमद

2:08

रुदी और मेहंदी हसन के मैजिक स्पेलेल को

2:10

तोड़कर उन्हें अपना दीवाना बनाई और फिर एक

2:12

इतवार को 17 साल का धान-पान सा लड़का

2:15

तारिक रोड से चलता हुआ पीटीवी स्टेशन

2:17

पहुंच गया। उसके पास कोई डिग्री, कोई

2:19

क्वालिफिकेशन, कोई सोर्स नहीं थी। वो तो

2:22

इस शहर में किसी को जानता भी नहीं था। वो

2:24

एक ऐसा अलबेला राही था कि जब सारा बंगाल

2:27

हमसे अलग हो गया था तो वो वहां से [संगीत]

2:30

पाकिस्तान आ गया। आया तो वो खाली हाथ था

2:32

लेकिन फिर कुछ ही दिनों में एक आलम इसका

2:35

दीवाना हो गया। आप सारे लोग तो समझ ही गए

2:37

होंगे लेकिन जजी व्यूज बस यह समझ ले कि

2:40

अगर यह सिंगर ना होता तो फिर जुनेद जमशेद

2:43

से लेकर आतिफ असलम तक कोई भी ना होता। ही

2:45

इज द अनडिस्प्यूटेड बाप ऑफ पाकिस्तानी

2:48

बाप। लेट्स मीट आलमगीर। [संगीत]

2:56

[संगीत]

3:07

[संगीत]

3:08

ये उस जमाने की बात है जब दो पाकिस्तान

3:10

हुआ करते थे। दोनों हिस्सों को बने अभी

3:12

चंद ही बरस गुजरे थे कि मशरिकी पाकिस्तान

3:14

के शहर रामपुर में अगस्त 1955 की सुबह

3:18

ईस्ट पाकिस्तान के एक नामवर सियासतदान

3:20

फरमूजुल हक के घर एक बच्चा पैदा हुआ।

3:23

फरमूज हक़ कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना

3:24

के दौर में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग से भी

3:26

वाबस्ता रहे और हुसैन शहीद सोहरवर्दी के

3:29

करीबी साथियों में शुमार होते थे। फरमूजुल

3:31

हक ने अपने बेटे का नाम आलमगीर रखा।

3:33

आलमगीर हक। बंगाल में वैसे भी म्यूजिक,

3:36

आर्ट्स और कल्चर हर घर का हिस्सा होता है।

3:38

लेकिन आलमगीर को म्यूजिक से कुछ ज्यादा ही

3:40

लगाव था। उस जमाने के हर नौजवान की तरह

3:43

आलमगीर भी एल्वस का दीवाना था। रिकॉर्डर्स

3:46

हो या रेडियो हर वक्त उसी का म्यूजिक

3:48

सुनता [संगीत] रहता। उसे एल्वस के गाने उस

3:50

स्कूल लेसन से जल्दी याद हो जाते। जैसे ही

3:52

कॉलेज शुरू हुआ तो उसके साथ दोस्तों के

3:54

जैमिंग सेशंस भी शुरू हो गए और फिर देखते

3:57

[संगीत] ही देखते जैमिंग सेशंस एक म्यूजिक

3:59

बैंड वाइंड साइड ऑफ केयर में बदल गए एंड

4:02

आलमगीर बिकम द लीड गिटारिस्ट। कॉलेज से

4:04

फारग हुआ तो बड़े भाई ने हुकुम दिया कराची

4:06

यूनिवर्सिटी से बैचलर्स करो। उसके बाद

4:08

सीधा मेरे पास अमेरिका आ जाना। [संगीत] उस

4:10

जमाने में कराची और केयू दोनों की बड़ी

4:13

वैल्यूज हुआ करती थी भाई। खैर, [संगीत] जब

4:15

आलमगीर कराची पहुंचकर अपने वाहिद

4:17

रिश्तेदार के घर पहुंचे, तो वहां ताला

4:19

पड़ा हुआ मिलता है। मालूम हुआ कि वो

4:21

रिश्तेदार तो मुल्क के बदलते हुए हालात

4:22

देखकर ढाका वापस जा चुके हैं। ना वापसी का

4:25

टिकट, ना कोई जान पहचान, ना उस दौर में

4:27

मोबाइल्स थे। ना फोन लाइंस के बंदा फोन कर

4:30

ले। सिर्फ टेलीग्राम या तार होते थे। मगर

4:33

उस लड़के ने मसनोई तार के बजाय अपने गिटार

4:36

के तार का सहारा लिया।

4:41

मशरिक पाकिस्तान के एक सियासी घराने में

4:43

आंख खोलने वाला यह नौजवान जिसने बचपन में

4:45

सिर्फ अंग्रेजी गाने सुने थे, भूख और

4:47

प्यास से निढाल झील पार्क में सो जाता है।

4:50

जब वो अगली सुबह जागा तो वह बिल्कुल अकेला

4:52

था। यहां उसने फैसला कर लिया कि अब इसे

4:55

अपनी पूरी जिंदगी खुद बनानी है। यह लड़का

4:57

तारिक रोड के लिबर्टी चौक पर वाकर कैफे डी

5:00

खान पहुंचा। वो चाहता तो खाना मांग कर भी

5:02

खा सकता था। अगर बंगाल का यह बेटा जानता

5:05

था कि अगर मांग कर खाया तो फिर जिंदगी भर

5:08

मांगते ही रहना पड़ेगा। उसने कैफे के

5:10

मालिक को कायल किया कि वो उसे गार्डन में

5:12

गिटार बजाकर गाना गाने दें। शायद लोग इस

5:15

मुनफरीद अंदाज से मुतासिर होकर कैफे का

5:17

रुख करें और यूं कारोबार तरक्की करें।

5:20

ख्याल में वाकई वजन था। आखिरकार ₹350 और

5:23

रात के खाने के एवज़ बात तय पा गई। जाके

5:26

मैंने जब एक होटल था होटल का मैनेजर मैंने

5:29

कहा कि आप इतना अच्छा लॉन है यहां आप

5:31

कुर्सी मेज रखें मैं गिटार बजाऊंगा गाना

5:34

गाऊंगा लोग आएंगे खाना खाएंगे आपका बिज़नेस

5:36

होगा

5:37

तो कह ये तो अच्छा आईडिया है शुरू किया

5:40

थर्ड डे मैं भूखा हुआ है गिटार बजा लोग

5:43

कढ़ाई खा रहे हैं

5:45

बारबक्यू

5:45

टिक्का खा रहे हैं बारबीक्यू खा रहे हैं

5:47

मेरे सामने दो घंटा मुझे जाना है फिर मुझे

5:49

डिनर मिलेगा ये बात हुई

5:51

कि आपको ₹350 महीने का मिलेगा और आपको

5:55

डिनर मिलेगा। डिनर डिनर डिनर मुझे मुझे

5:59

टारगेट मिल गया। दैट वाज़ माय टारगेट ना

6:01

फॉर द फर्स्ट थिंग वाज़ माय सर्वाइवल का।

6:03

अब मसला दिन गुजारने का था। तो वो टीवी के

6:05

मशहूर शो फिरोजा की प्रोडक्शन टीम की एक

6:07

खातून ने पूरा कर दिया जो अक्सर यहां आया

6:10

करती थी। यह वो दौर था जब लोग दिन भर की

6:12

थकान के बाद शाम में कैफे, होटल्स, कॉफी

6:14

हाउस या नाइट क्लब जाया करते थे। ना मॉल्स

6:16

थे ना फूड कोर्ट। शहर की पढ़ी लिखी

6:18

ज्वेलरी इन्हीं जगहों पर जमा होती थी।

6:20

टीवी पर नौजवानों का एक शो फिरोजा के नाम

6:22

से चलता था। जिसे मोहसिन अली प्रोड्यूस

6:25

किया करते थे और दोस्त मोहम्मद फैजी इनके

6:27

माउन थे। दोस्त मोहम्मद फैजी तक आलमगीर हक

6:30

का चर्चा पहुंचा और इसे शो में मधु करने

6:32

का फैसला हुआ। तब आलमगीर का बोलने का

6:34

अंदाज खालिस बंगाली था और शायद इसी वजह से

6:37

वह खुशबख्त आलिया के मयार पर पूरा नहीं

6:39

उतरे। इनसे यह कहकर माज़रत की गई कि इनकी

6:41

जगह किसी और को लिया जा चुका है। अलबत्ता

6:44

जब वो गिटार बजा रहे थे तो इनके तारों की

6:46

आवाज सुहेल राणा के कानों तक पहुंच गई।

6:53

सुहेल राणा उस वक्त फिल्मों में निस्बतन

6:55

कम और टीवी में ज्यादा काम करते थे।

6:57

इन्हें अपने बच्चों के शो के लिए एक

6:59

गिटारिस्ट की [संगीत] जरूरत थी। सुहेल

7:00

राणा को हर प्रोग्राम के लिए दो नए गाने

7:02

बनाने होते थे। बच्चों को संभालने और

7:04

प्रोग्राम देखने में इनका ध्यान बटा रहता

7:06

था। ऐसे में आलमगीर ने इनकी मदद की और

7:08

जल्द ही धुनें कंपोज कर दी और इन खिदमत के

7:11

एवज़ उन्हें पीटीवी से ₹14 का पहला चेक

7:15

मिला।

7:16

[संगीत]

7:20

आ गया [संगीत]

7:25

आलमगीर आ चुका था मगर अभी छाया नहीं था।

7:29

उसका नाम सिर्फ कराची स्टेशन तक महदूद था।

7:31

जहां जिया मोइद्दीन भी शो करते थे। कराची

7:33

के मशहूर फ्लट क्लब में हर हफ्ते लाइव

7:36

जाने वाले शो में जिया मोइद्दीन हर बार

7:38

कुछ नया करने की कोशिश करते थे। इस शो से

7:40

मारूफ कॉमेडियन खालिद अब्बास डार, इस्माइल

7:43

तारा और मोईन अख्तर मुतारिफ हो चुके थे।

7:45

एक दिन उन्होंने आलमगीर को अपने शो के

7:47

ऑडिशन के लिए दफ्तर बुला लिया और यहां

7:49

एल्विस प्रेसले का इश्क आलमगीर के काम आ

7:51

गया। जियामुद्दीन आलमगीर से कुछ अंग्रेजी

7:53

गाने सुने और फिर पूछा कि बरखुरदार क्या

7:55

तुम स्पेनिश में भी कुछ गा सकते हो?

7:58

आलमगीर ने कहा कि इन्हें कोई भी गाना एक

8:00

बार सुना दें बाकी वो संभाल लेंगे।

8:02

जियाद्दीन के घर से रिकॉर्डर मंगवाया गया

8:04

और रिकॉर्ड पर उन्हें क्यूबन सॉन्ग सुनाया

8:06

गया। आलमगीर ने कुछ बार गाना सुना और फिर

8:09

वही गाना जिया मोइद्दीन को ऐसे सुनाया कि

8:12

वह उछल पड़े। जियाद्दीन को अपना नया स्टार

8:14

और आलमगीर को पहला प्राइम टाइम चांस मिल

8:17

गया। जियामुद्दीन शो लाइव जा रहा था और

8:20

स्टेज पर बंगाली निजात रुना लैला गाना गा

8:22

रही थी। जिया साहब रोना को मुतारिफ करा कर

8:24

स्टेज के पीछे आलमगीर के पास आए और इनका

8:27

पूरा नाम पूछा। आलमगीर ने हक छुपा कर

8:30

सिर्फ यह कह दिया आलमगीर। उन्हें लगा कि

8:32

हक का लफ्ज़ उनके नाम को भारी और लंबा बना

8:35

देगा। जिया मोइद्दीन स्टेज पर गए और

8:37

पुकारा तशरीफ लाते हैं आलमगीर। बस यहां से

8:41

आलमगीर हक सिर्फ आलमगीर बने और फिर इसी

8:45

नाम से उन्होंने आलमगीर शहरत हासिल की।

8:53

[गाना गाने की आवाज़]

8:59

मा

9:00

दे मोरी में दो एक्मा

9:06

[संगीत]

9:10

[गाना गाने की आवाज़] मेरा

9:14

मेरा

9:16

जिया मोईद्दीन शो में परफॉर्मेंस के बाद

9:18

आलमगीर को कुछ फेम तो मिला था लेकिन एक

9:20

स्पेनिश गाना गाकर कोई कितना ही हिट हो

9:23

सकता है। इस कहानी को आगे बढ़ाने के लिए

9:25

मदद पहुंची बांग्लादेश से।

9:28

जब 1972 में पाकिस्तान और भारत के दरमियान

9:30

शुमला मुहायदा हुआ तो पाकिस्तान ने

9:32

बांग्लादेश को तस्लीम किया तो भारतीय कैद

9:35

में मौजूद हजारों पाकिस्तानी वापस वतन लौट

9:37

आए। उन्हीं में से एक थे टीवी प्रोड्यूसर

9:39

एम ज़हीर खान जो फॉल ऑफ ढाका के वक्त

9:42

पीटीवी ढाका सेंटर में काम करते थे। कराची

9:44

पहुंचकर एम ज़हीर खान ने पीटीवी सेंटर में

9:46

दोबारा काम संभाला। उनके ज़हन में एक नए

9:49

अंदाज का म्यूजिक प्रोग्राम बनाने का

9:50

ख्याल था। यू संडे के संडे के नाम से अपने

9:53

दर्स का मुनफरीद प्रोग्राम शुरू हुआ।

9:55

मेजबानी मोइन अख्तर करते थे। शहनाज बेगम,

9:58

मोहम्मद इब्राहिम और इखलाक अहमद जैसे

9:59

फनकार गाया करते थे। जबकि पीछे मुकम्मल

10:01

आर्केस्ट्रा होता था। आलमगीर भी उसी

10:04

आर्केस्ट्रा का हिस्सा बन गए। एक दिन एम

10:06

ज़हीर खान ने उन्हें स्टूडियो के बाहर

10:07

गिटार बजाता देखा। आलमगीर वही गीत गा रहे

10:10

थे जो वो पहले जियाद्दीन शो में गा चुके

10:12

थे। एम ज़हीर खान ने शायर सिद्दीकी से कहा,

10:15

गोंताना मेरा को उर्दू रंग में ढाला जाए।"

10:17

अगले ही शो में आलमगीर सिर्फ गिटार नहीं

10:19

बजा रहे थे। वो गा भी रहे थे। रक्स भी कर

10:22

रहे थे और सबसे बढ़कर यह अब वो कोर्स का

10:25

हिस्सा नहीं थे। वो सेंटर स्टेज थे। साथी

10:28

[संगीत]

10:30

गम बनाओ ना साथी।

10:35

अलबेला [संगीत] राही

10:39

मैं हूँ अलबेला राही।

10:43

अलबेला [संगीत]

10:44

राही

10:46

मैं हूँ अलबेला राही।

10:51

अलबेला राही ने धूम मचा दी। यह गाना सिर्फ

10:54

एक हिट नहीं था, यह एक इंकलाब था। नौजवान

10:56

नस्ल ने इसे हाथों हाथ लिया। आलमगीर के

10:59

आने से पहले ज्यादातर गीत फिल्मी हुआ करते

11:01

थे। इनमें फिल्मी सुरते हाल, महबूब को

11:03

मनाने की कोशिश, जुदाई का दुख, जमाने की

11:05

तल्लखियां या बगावत का कोई ना कोई असर

11:08

शामिल होता था। ये गाने बड़े बकायदा

11:10

शायरों के लिखे होते थे। इनकी धुनें मंजर

11:12

के मुताबिक तरतीब दी जाती थी। और फिर कोई

11:14

तरबियत याफ्ता आवाज ही उन्हें गाती थी।

11:16

मगर नौजवान नस्ल को अब कुछ और चाहिए था।

11:19

उन्हें ऐसे गीत दरकार थे जो उनकी अपनी

11:21

जुबान बोले, जिनके अल्फाज़ रोजमर्रा

11:23

गुफ्तगू जैसे हो। मौसी की हल्की और सादा

11:26

हो और जिन्हें सुनते हुए लगे कि यह बात वो

11:29

खुद भी आम जिंदगी में कह सकते हैं। जब

11:31

बंदा तन्हा होता है तो वो गाता है

11:33

सोना-सोना जीवन अपना। शायद ही ऐसी कोई

11:36

शादी हो जो गोरी तुम वो दिन याद करो कि

11:39

बगैर मुमकिन हुई हो। इंतजार शाम से पहले

11:41

आना के बगैर मुमकिन ही नहीं। किसी की

11:44

आंखों की तारीफ करनी हो तो, तो मेरी आंखें

11:46

हो, मैं ख्वाब जैसा हूं से बेहतर गाना कोई

11:48

नहीं। खुशियों में बादल भी और पानी भी या

11:51

देख तेरा क्या रंग कर दिया है गाया जाता

11:53

है। जबकि महबूब के लिए ओ जाने जाना सहारा

11:56

देना एक परफेक्ट सॉन्ग था। आलमगीर के गीत

11:59

दरअसल एक नई सोच और नई नस्ल की तर्जुमानी

12:01

थे। आलमगीर ने मगर पॉप मौसी को उर्दू और

12:04

बंगाली रंग में ढालकर एक नई पहचान दी और

12:06

देखते ही देखते वो पाकिस्तान के पहले पॉप

12:09

सुपरस्टार बन गए।

12:10

रहती है [संगीत] वो दूर कहीं अदा होता

12:13

मालूम नहीं

12:20

आलमगीर के फैंस तो बहुत हो चुके थे लेकिन

12:22

अभी उन्हें बड़ों से आशीर्वाद लेना बाकी

12:24

था और यह काम हुआ साल के आखिरी रात को।

12:26

दरअसल बांग्लादेश के कयाम के बाद

12:28

पाकिस्तान में मौजूद बंगाली अफराद की सख्त

12:30

निगरानी की जा रही थी। शहनाज बेगम जिनका

12:32

एक भाई मुक्ति बाहिनी का सरगरम रुकुन था

12:34

उन्हें हर वक्त यह डर रहता था कि कहीं

12:36

उन्हें भी गिरफ्तार ना कर लिया जाए। अपनी

12:38

इसी परेशानी का जिक्र उन्होंने सुहेल राणा

12:40

से किया। जिन्होंने अपने और वहीद मुराद के

12:43

म्यूचुअल फ्रेंड जावेद अली खान से

12:45

दरख्वास्त की कि वो शहनाज बेगम को अपने

12:47

किसी घर में पनाह दे दे। कुछ दिनों बाद

12:49

सोहेल राणा ने आलमगीर के लिए भी वही

12:50

दरख्वास्त की और जावेद अली खान उन्हें भी

12:53

अपने घर ले आए और यहां से एक नई कहानी

12:55

स्टार्ट हुई।

13:01

कराची जिमखाना में 31 दिसंबर 1972 की न्यू

13:04

ईयर नाइट के लिए एक खुसूसी म्यूजिक शो का

13:06

एतमाम किया जा रहा था। इवेंट प्लानर्स

13:09

जानते थे कि जावेद अली खान की अहमद रुदी

13:11

और शहनाज बेगम से अच्छी जान पहचान है।

13:13

इसीलिए उन्होंने इनसे दरख्वास्त की कि वो

13:15

दोनों सिंगर्स को प्रोग्राम के लिए

13:16

कन्वेंस करें। खैर अहमद रुदी और शहनाज

13:19

बेगम न्यू ईयर नाइट प्रोग्राम के लिए

13:20

तैयार हो गए। जावेद अली खान ने इन दोनों

13:22

के साथ आलमगीर को भी एज अ गिटारिस्ट शो

13:24

में एडजस्ट करवा दिया। शो के एक ब्रेक के

13:26

दौरान जब अहमद रुदी और शहनाज बेगम बैक

13:29

स्टेज गए तो लोगों ने शोर मचाना शुरू कर

13:31

दिया। ऐसे में आलमगीर ने गिटार संभाला और

13:34

अपने मकसूस बंगाली लहजे में अंग्रेजी और

13:36

भारतीय गाने गाना शुरू कर दिए। कराची का

13:38

जिमखाना झूम उठा। हॉल में वंस मोर वंस

13:41

[संगीत] मोर के नारे गूंजने लगे। और फिर

13:43

एक अजीब वाक्या हुआ। जब अहमद रुजदी वापस

13:45

स्टेज [संगीत] पर आए तो उन्होंने माइक

13:47

वापस आलमगीर को दिया और मुस्कुरा कर कहा

13:49

बेटा तुम गाओ। अब यह स्टेज तुम्हारा है।

13:52

आलमगीर अब मशहूर तो हो गए थे, लेकिन इनके

13:54

फाइनेंसियल मसाइल अब भी जू के तू थे। और

13:57

यहां इनकी मदद के लिए सीनियर म्यूजिशियन

13:59

करण पॉप, सेंसेशन आसिम अज़र के वालिद अज़हर

14:02

हुसैन [संगीत] साहब आए। अज़हर साहब का

14:03

शुमार पाकिस्तानी फिल्म्स के बेहतरीन

14:05

म्यूजिक प्रोड्यूसर्स में किया जाता था।

14:07

आलमगीर ने जब अपनी परेशानी का जिक्र इनसे

14:09

किया तो उन्होंने आलमगीर को

14:10

इंटरकॉन्टिनेंटल होटल लाहौर में ₹1500

14:13

महाना पर मुलाजिम रखवा दिया। उस जमाने में

14:15

आलमगीर का हुलिया खासा डिफरेंट था। लंबे

14:17

बाल, घनी मूछे, चौड़े पांचों वाले जींस और

14:20

ढीली कमीज़। इंटरकॉन्टिनेंटल लाहौर में उस

14:22

दौर की बड़ी शख्सियत आया करती थी। पंजाब के

14:24

वज़र-आला गुलाम मुस्तफा घर, मुमताज भुट्टो,

14:27

अदाकार नदीम, शबनम, रॉबिन घोष जैसे नामवर

14:30

शख्सियात वहां मौजूद होती। एक दिन अदाकार

14:32

नदीम ने अज़र हुसैन से कहा कि यह लड़का तो

14:34

बड़ा टैलेंटेड है। लेकिन हुलिया कुछ

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ज्यादा ही अजीब रखता है। नदीम ने अपने

14:38

डिजाइनर का कार्ड आलमगीर के हवाले कर दिया

14:40

और जल्द ही आलमगीर ढंग के हुलिय में नजर

14:43

आने लगे। अजहर हुसैन ने उनकी मुलाकात रोबन

14:45

घोष से भी करवाई। जिसके बाद जब तक आलमगीर

14:47

लाहौर में रहे वो रोबन घोष के घर में ही

14:49

रहे। उसी अरसे में उन्होंने कई गाने गाए

14:52

जिनमें मोम की गुड़िया का मशहूर नगमा तुम

14:54

मेरी जिंदगी हो और आईना के दो गाने वादा

14:57

करो सजना और मुझे दिल से ना भुलाना शामिल

15:00

थे।

15:01

दिल से [संगीत]

15:08

लेकिन लॉलीवुड में आलमगीर की असल पहचान

15:10

जिस गाने से बनी उसकी कहानी बड़ी

15:12

इंटरेस्टिंग है। दरअसल सीन कुछ यूं हुआ कि

15:15

उस जमाने के टॉप म्यूजिशियन निसार बजमी ने

15:17

एक इंटरव्यू दिया। उस इंटरव्यू में कुछ

15:19

बातें ऐसी थी जो मैडम नूरजहां को अच्छी

15:21

नहीं लगी। मैडम ने बज्मी साहब के बॉयकॉट

15:24

का ऐलान कर दिया। उसी जमाने में

15:25

प्रोड्यूसर अली सुफियान अफाकी फिल्म जागीर

15:28

की शूटिंग कर रहे थे और निसार बजमी को

15:30

साइन कर चुके थे। फिल्म के बाकी गाने तो

15:32

रिकॉर्ड हो गए थे मगर एक सोलो सॉन्ग के

15:34

लिए मेल सिंगर की जरूरत थी। लेकिन

15:36

गुलकारों की एसोसिएशन के सदर मसूद राणा ने

15:39

साफ कह दिया कि वो किसी सिंगर को बशूल

15:41

अहमद रुदी इजाजत नहीं देंगे कि वो यह गाना

15:44

गाएं। अफाकी साहब गुस्से में बिखर गए और

15:46

कहा कि उस वक्त से डरे जब हम फिल्में

15:48

बनाना छोड़ दें और आप लोगों को कोई पूछे

15:51

भी ना। इस सिचुएशन में बज्मी साहब ने

15:53

आलमगीर से एक ऑडिशन करवाया। अफाकी साहब ने

15:55

जब ऑडिशन सुना तो इसे फौरन अप्रूव कर

15:57

दिया। अगले दिन मसूद राणा ने आकर कहा कि

16:00

एसोसिएशन ने इजाजत दे दी है। और अब अहमद

16:02

रुदी ये गाना गा सकते हैं। मगर अफाकी साहब

16:05

अड़ गए और कहा कि यह गाना तो यह नौजवान ही

16:08

गाएगा। और यूं अहमद रिशदी के लिए बना गाना

16:10

हम चले तो हमारे संग संसंग नजारे चले।

16:13

आलमगीर ने गाया। हम चले [संगीत]

16:16

तो हमारे

16:19

संग के नजारे चले। [संगीत]

16:22

1975 में लाहौर टेलीविजन के डायरेक्टर

16:25

जमान अली खान ने द आलमगीर शो के नाम से एक

16:27

प्रोग्राम किया जिसमें मौसी करीम

16:29

शाहबुद्दीन थे। वैसे तो इस शो के सारे

16:32

गाने ही हिट हुए लेकिन देखा ना था कभी

16:34

हमने यह समा तो सुपरहिट हो गया। इसकी एक

16:37

बड़ी वजह इस गाने की वीडियो भी थी जिसमें

16:39

आलमगीर एक ईरानी डांसर नाज़ के साथ डांस

16:42

कर रहे थे। जिया के दौर में इस वीडियो से

16:44

डांस सींस निकाल दिए गए और लिरिक्स में

16:46

नशा के बजाय जादू का लफ्ज़ डाल दिया गया।

16:55

इसे सुनकर पाकिस्तानी म्यूजिक प्रोड्यूसर

16:57

ने भी सोचा कि क्यों ना वो भी अंग्रेजी

16:59

में गाना बनाएं। भले ही उन्हें अंग्रेजी

17:01

आती हो या नहीं। इस काम के लिए सबसे आसान

17:03

ट्यून लाल मेरी पथ को चुना गया और इस पर

17:06

अंग्रेजी के कुछ बोल लिखे गए। सिंगर के

17:09

लिए सबकी पहली चॉइस आलमगीर थी। लेकिन जब

17:11

उन्होंने गाने के बोल सुने तो फौरन ही समझ

17:14

गए कि यह बोल बिल्कुल डब्बा हैं। उन्होंने

17:16

कहा पहले लिरिक्स ठीक करें फिर गाऊंगा।

17:19

डायरेक्टर साहब गुस्से में आ गए और धमकी

17:21

लगा दी कि अगर गाया नहीं तो वो आलमगीर का

17:23

कैरियर तबाह कर देंगे। धमकी सुनकर आलमगीर

17:25

ने उसी दिन लाहौर छोड़ दिया और यह गाना

17:28

अहमद रुदी को मिल गया जिन्होंने इसे गा भी

17:30

दिया। ह्यूमैनलिंग

17:33

दमोद मस्त कलंदर

17:37

आलमगीर कराची वापस आए तो ईएमआई ने इनके

17:40

साथ मिलकर इनकी एक सोलो एल्बम रिलीज की

17:43

जिसने तहलका मचा दिया। यह पाकिस्तानी

17:45

तारीख के किसी भी सिंगर का पहला सोलो

17:47

एल्बम था।

17:50

दिसंबर 1976 में इलेक्शन सर पर थे। पीटीवी

17:53

स्क्रीन रंगीन हो चुकी थी और इस नई

17:55

स्क्रीन को कुछ नए प्रोग्राम्स की जरूरत

17:57

थी। शोएब मंसूर ने क्रोमा स्क्रीन के साथ

18:00

एक प्रोग्राम का तजुर्बा किया। प्रोग्राम

18:01

का नाम था झरने। आलमगीर इस प्रोग्राम के

18:04

लीड सिंगर थे। इस शो में उन्होंने सुपरहिट

18:06

गाने यह शाम और तेरा नाम और आखिरी एपिसोड

18:08

में जिसका नाम नहीं लिया परफॉर्म किए। इस

18:10

प्रोग्राम से आलमगीर की मौसी नियाज़ अहमद

18:13

और शायर मोहम्मद नासिर के साथ जोड़ी बन

18:15

गई। उसके बाद आलमगीर के 80% गाने मोहम्मद

18:17

नासिर ने लिखे। चाहे वो देख तेरा क्या रंग

18:20

कर दिया है हो। तेरी बातें याद आती है हो

18:22

या शाम से पहले आना हो। उस दौर में

18:25

मोहम्मद अली शहकी भी टीवी स्क्रीन पर उभर

18:27

कर सामने आए। ईरानी निजाद शहकी की कहानी

18:29

कई हवालों से आलमगीर से मिलती जुलती थी।

18:32

वक्त के साथ-साथ दोनों के दरमियान एक

18:34

साइलेंट टसल शुरू हो गई और उस टसल का सबसे

18:36

ज्यादा फायदा उठाया म्यूजिक कंपनीज़ ने

18:38

जिन्होंने आलमगीर एंड शहकी के नाम से

18:40

कैसेटें बेचीं। 1982 में आलमगीर ने खुद

18:43

म्यूजिशियन बनने का फैसला किया। उनका यह

18:45

फैसला पीटीबी के खुदाओं को चैलेंज करने के

18:47

मुतरादिव था। क्योंकि PTV पर उसूल था कि

18:49

कोई भी म्यूजिशियन परफॉर्म करेगा तो वह

18:52

म्यूजिक इसकी अपनी नहीं होगी। आलमगीर ने

18:55

प्रोड्यूसर सुल्ताना सिद्दीकी से बात की।

18:57

जिन्होंने भरपूर साथ देते हुए कहा कि

18:59

तुम्हें जो करना है करो। एतराज करने वालों

19:01

को वो खुद देख लेंगी। उसी दौर में जींस और

19:03

टी-शर्ट में गाने वाले आलमगीर पर नौजवानों

19:05

को खराब करने का इल्जाम भी लगा। पीटीवी पर

19:08

हुकुम जारी हुआ कि मर्द शलवार कमीज और

19:10

खवातीन दुपट्टे के साथ स्क्रीन पर आएंगी।

19:12

यूं आलमगीर भी ज्यादातर शलवार कमीज में ही

19:14

नजर आने लगे।

19:18

दिसंबर 1972 में आलमगीर ने कराची जिमखाना

19:21

में जो मेला लूटा था इसकी वजह से वह न्यू

19:23

ईयर पार्टी का लाजमी हिस्सा बन गए थे

19:25

क्योंकि पीसी होटल और कराची जिमखाना करीब

19:27

ही वाकिफ है तो आलमगीर ने सोचा कि क्यों

19:29

ना ब्रेक के आधे घंटे में कुछ और पैसे कमा

19:31

लिए जाएं। उन्होंने पीसी होटल से भी

19:33

कॉन्ट्रैक्ट पकड़ लिया। आधा घंटा इधर गाना

19:35

गाते दीवार फलांग कर उधर जाते और वहां

19:38

गाना गाकर वापस आ जाते। जिमखाना इंतजामिया

19:40

ने यह देख लिया और इन पर पाबंदी लगा दी जो

19:42

कई सालों लगी रही। जिस दौर में पाबंदी लगी

19:45

उन्होंने इंडिया का दौरा किया और वहां

19:47

दिल्ली, मद्रास और मुंबई में कॉन्सर्ट

19:49

किए। मुंबई में मशहूर प्लेबैक सिंगर

19:51

शब्बीर कुमार से मिले और अगले रोज उनके

19:53

साथ फिल्म सिटी गए। जहां धर्मेंद्र,

19:55

श्रीदेवी और अनू मलिक से [संगीत] मुलाकात

19:57

हुई। हैरानक तौर पर अनू मलिक ने उन्हें

19:59

उनके गीत देख तेरा क्या रंग कर दिया है

20:01

इसे पहचान लिया और इसरार किया कि वह अपनी

20:03

अगली फिल्म के लिए गीत गवाना चाहते हैं।

20:05

मगर आलमगीर को बड़ी मुश्किल से कराची जिम

20:07

खाना का कॉन्ट्रैक्ट वापस मिला था। इसलिए

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उन्होंने माज़रत कर ली। आमतौर पर पॉप सिंगर

20:11

की शादी किसी फैन लड़की से होती है। मगर

20:14

आलमगीर का केस अलग था। इनके घर के पास एक

20:17

खातून रहती थी, जिन्हें वो अपनी मां की

20:19

तरह आंटी ज़किया कहते थे। उन्होंने बिना

20:21

बताए विंग कमांडर दबीर सिद्दीकी की

20:24

साहबजादी शहला से आलमगीर की शादी तय कर

20:26

दी। आलमगीर ने बुरा मनाया कि यह हक सिर्फ

20:28

उनकी मां का है। मगर आंटी जकिया ने कनाडा

20:30

में मुकीम इनकी बीमार वालदा का नंबर

20:32

ढूंढकर उन्हें पाकिस्तान बुला लिया। शैला

20:35

के घर ले गई और बात पक्की करवा दी।

20:38

आलमगीर ने 50 से ज्यादा मुल्कों का दौरा

20:41

किया और 17 मुख्तलिफ जुबानों में गाने

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गाए। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि वो जब

20:45

भी किसी गैर जुबान का गाना सीखते तो उस

20:47

मुल्क की एंबेसी जाकर वहां मौजूद मुकामी

20:49

अफराद को वो गीत सुनाते ताकि तलफुस और

20:52

अदायगी दुरुस्त हो सके। 80 की दहाई में

20:54

रिवाज था कि पाकिस्तान के टॉप फनकार नॉर्थ

20:56

कोरिया के स्प्रिंग फेस्टिवल में परफॉर्म

20:58

करने जाते थे। जब आलमगीर नॉर्थ कोरिया गए

21:00

तो उन्होंने वहां रिवायत के मुताबिक एक

21:02

मुकामी गाना गाया। 10,000 के मजमे में

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सन्नाटा छा गया। मगर 20 मिलियन लोग जो

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घरों पर टीवी देख रहे थे, इनकी आंखों में

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आंसू थे। अखबार में हेडिंग लगी। सिंगर

21:10

फ्रॉम पाकिस्तान आलमगीर संग कोरियन सॉन्ग

21:13

बेटर देन द ओरिजिनल। नॉर्थ कोरिया के सदर

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ने उन्हें लाइन हाजिर किया। जब आलमगीर को

21:17

पता चला कि उन्हें 160 म्यूजिशियन के

21:19

आर्केस्ट्रा के साथ गाना है तो वह घबरा

21:21

[संगीत] गए क्योंकि उन्होंने पहले कभी ऐसा

21:22

नहीं किया था। मगर जब उन्होंने सदर के

21:24

सामने गीत पेश किया तो सदर ने आकर कहा

21:27

डोंट टेल मी कि आप कोरियन नहीं हैं।

21:29

उन्होंने जनरल जियाउल हक को फोन करके कहा

21:31

कि जब तक वो जिंदा है आलमगीर यहां आकर

21:33

परफॉर्म करता रहेगा और नॉर्थ कोरिया का

21:35

सबसे बड़ा एजाज ओमेगा वॉच आलमगीर को तोहफे

21:38

में दिया।

21:38

कंट्री वाज़ वीपिंग [संगीत]

21:40

व्हेन आलमगीर वाज सिंगिंग दैट कोरियन

21:41

सॉन्ग। सो द किमलोंग हु इज द प्रेसिडेंट

21:44

देन ही केम टू [संगीत] सी माय शो एंड केम

21:47

अ शिक हैंड्स विथ मी एंड देन ही गव मी दैट

21:49

ah द प्राइड ऑफ़ परफॉर्मेंस एंड दैट इज अ

21:51

ओमेगा रिस्ट वॉच विथ हिज़ ऑटोग्राफ एंबोस्ड

21:54

इन इट।

21:54

आलमगीर को सिर्फ पॉप ग्लूकार कहना इनके फन

21:56

के साथ नाइंसाफी होगी। इनके मिली नगमे भी

21:59

तासीर और तवानाई में किसी से कम नहीं थे।

22:01

शायद ही कोई पाकिस्तानी हो जो आलमगीर का

22:03

मिली नगमा ख्याल रखना सुनकर आराम से बैठा

22:05

रहे। [संगीत]

22:11

बेंजमिन सिस्टर्स के साथ गाया जाने वाला

22:13

यह गीत आज भी स्कूलों में बजाया जाता है।

22:16

मांओं की दुआ पूरी हुई।

22:18

की दुआ

22:20

[गाना गाने की आवाज़][संगीत] पूरी हुई।

22:23

ए पाक वतन तुझे मेरा खुदा यूं कायमो दायमो

22:26

शाद रखे। [संगीत]

22:30

और पाकिस्तान एयरफोर्स का मिली नगमा। तुम

22:33

ही से ए मुजाहिदो जहां का सिबात है। आज भी

22:36

यौमे फिजाइया की पहचान [संगीत] है। इस

22:41

जहां का

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1979 में आलमगीर अचानक पाकिस्तान से

22:45

बांग्लादेश चले गए थे। कहा जाता है कि वो

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मुसलसल काम से थक कर मां की खिदमत के लिए

22:49

गए थे। एक इल्जाम यह भी लगा कि उस दौर के

22:52

मशहूर समद दादा बॉय स्कीम में उनका नाम

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आया था जो लोगों से सरमाया इकट्ठा करके

22:56

फरार हो गया था। मगर कोई ठोस सबूत नहीं

22:59

मिला। इनके अपने बयान के मुताबिक अमेरिका

23:01

जाने का मकसद सिर्फ यह था कि इनके बेटे को

23:03

बेहतरीन तालीम मिल सके। 1991 में पीटीवी

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के एक प्रोग्राम में आलमगीर ने फिल्म

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अरमान का मशहूर गीत कोको कोरीना अपने

23:10

अंदाज में पेश करके सुहेल राणा और अहमद

23:12

रुजरी को खराजे तहसीन पेश किया।

23:15

वाली सी नाजुक सी शर्मीली सी मासूम

23:18

[संगीत] सी बोली भाली सी रहती है वो दूर

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कहीं अदा होता मालूम [संगीत] नहीं।

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उस परफेंस के बाद कई नौजवान पहली बार यह

23:30

सोचने में मजबूर हुए कि अहमद जोश कौन थे?

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क्या सुहेल राणा ने फिल्मों में भी मौसी

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दी है? सन 2010 में मालूम हुआ कि उनके

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दोनों गुर्दे नकारा हो चुके हैं और हफ्ते

23:39

में तीन बार डायलिसिस होता है। मुसलसल

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इलाज ने उन्हें माली तौर पर कमजोर कर दिया

23:43

था। इस दौरान हुकूमत पाकिस्तान ने उन्हें

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लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड और प्राइड ऑफ

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परफॉर्मेंस से नवाजा और माली मौनत भी की।

23:50

13 साल डायलिसिस पर रहने के बाद इनका

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कामयाब किडनी ट्रांसप्लांट हुआ। आलमगीर की

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कहानी दरअसल उस सकाफती मजामत की कहानी है

23:58

जो जनरल जियाउल हक के दौर में मौसी के

24:00

जरिए सामने आई। जियाउल हक के नजदीक मौसी

24:03

की एक नापसंदीदा शह थी। चुनाचा उसी जमाने

24:06

में जो मौसी की बाकी रह गई थी, वह महज

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रसमी सी महसूस होती थी। मगर आलमगीर ने उसी

24:11

दौर में मौसी को दोबारा जिंदगी बख्शी। बाद

24:14

में यही रास्ता नाजिया हसन, ज़हेएब हसन,

24:17

जून, स्ट्रिंग्स और वाइटल साइंस ने

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अपनाया। इन सब ने मिलकर एक ऐसी नस्ल को

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सांस लेने दी, जिसे मुसलसल घुटन में रखा

24:25

जा रहा था। और यह शायद उनका इस कौम पर

24:28

सबसे बड़ा एहसान है कि उन्होंने सिर्फ

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गाने नहीं गाए बल्कि एक घुटनजदा दौड़ में

24:33

नौजवानों को यह यकीन दिलाया कि हां ओसी की

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आज भी रूह की गजा है।

Interactive Summary

यह वीडियो पाकिस्तान के प्रसिद्ध पॉप गायक आलमगीर के जीवन और उनके संगीत करियर की कहानी बयां करता है। इसमें उनके बांग्लादेश से पाकिस्तान आने, संघर्ष के दिनों, कैफे डी खान में गिटार बजाने और फिर 'अलबेला राही' जैसे गानों के जरिए पाकिस्तान के पहले पॉप सुपरस्टार बनने तक का सफर शामिल है। वीडियो में उनके द्वारा संगीत की नई शैली पेश करने, टीवी शो में उनके योगदान, और कठिन राजनीतिक दौर में उनके संगीत की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।

Suggested questions

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