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Maududi vs Deoband: The Ideological War That Shaped Pakistan | Jihad, Nationalism & Khilafat Debate

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Maududi vs Deoband: The Ideological War That Shaped Pakistan | Jihad, Nationalism & Khilafat Debate

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602 segments

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जनवरी 1927 की एक दोपहर है। दिल्ली की

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जामा मस्जिद नमाजियों से खचाखच भरी हुई

0:07

है। मौलाना मोहम्मद अली जौहर जैसे शोला

0:10

बयान खतीब जुम्मे का खुदबा दे रहे हैं।

0:13

मजमे में मौजूद हर शख्स मौलाना मोहम्मद

0:15

अली जौहर की जुबान से निकलने वाले एक-एक

0:17

लफ्ज को गौर से सुन रहा है। कि मौलाना

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भरती हुई हिंदू मुस्लिम कशीदगी में

0:21

मुसलमानों की क्या रहनुमाई करते हैं।

0:25

मगर मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने मुसलमानों

0:28

को दफाई पोजीशन से निकालने का एक मुश्किल

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नुस्खा पेश कर दिया। उन्होंने कहा कि काश

0:34

कोई बंदा खुदा इस्लाम के तस्सवुर जिहाद पर

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एक ऐसी किताब लिखे जो मुखालफिन के सारे

0:40

एतराज दूर करके जिहाद की असल हकीकत दुनिया

0:43

पर वाज़ कर दे। असल हकीकत दुनिया पर वाज़ कर

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दे। उस वक्त दिल्ली की जामा मस्जिद में एक

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नौजवान सहाफी भी मौजूद है। जिसने मौलाना

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मोहम्मद अली जौहर का यह जुमला सुनकर दिल

0:54

में अपने आप से सवाल किया वो बंदा खुदा

0:57

मैं क्यों ना हूं। वो बंदा खुदा ये ख्याल

1:00

आते ही उस नौजवान ने फैसला कर लिया कि यह

1:02

चैलेंजिंग काम उसने ही करना है।

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वो नौजवान सफी था जमीयत उलमा-ए-ह हिंद के

1:09

रिसाले अल जमिया का 24 साला एडिटर सैयद

1:13

अबु लाला मौदूदी।

1:16

मेरा मुंह काला कर देना कोई आसान काम नहीं

1:19

है और मेरी मुलाकफात से बेनियाजब होकर

1:22

अल्लाह के रास्ते की तरफ अल्लाह के बंदों

1:24

को बुलाने में लगे।

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कहते हैं कि तारीख में कोई घड़ी सदियों से

1:30

बड़ी होती है और वो लम्हा भी शायद सदियों

1:33

से बड़ा था जब हजारों के मजमे में मौजूद

1:36

सिर्फ उसी एक नौजवान ने इस्लाम के तस्सवुर

1:39

जिहाद पर किताब लिखने का फैसला किया। यानि

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मौलाना मोहम्मद अली जौहर का खिताब ही वो

1:43

लम्हा साबित हुआ जिसने सैयद अबुल आला के

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मौलाना मौदूदी बनने की बुनियाद रखी।

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मौदूदी और उलमा देवबंद के सर्दो गर्म

1:53

ताल्लुकात की कहानी शुरू करने से पहले

1:55

फाउंडर अवतार फरहान मलिक का यह पैगाम जरूर

1:58

सुनिए।

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कंटेंट क्रिएटर्स के पास तीन तरीकों से

2:01

पैसा आता है। मोनेटाइजेशन, स्पोंसरशिप्स

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और फंडिंग। फंडिंग हमारे पास है नहीं। और

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आपने यह भी नोट किया होगा कि रफ्तार की

2:07

अक्सर वीडियोस पर कोई स्पों्सर्स नहीं

2:10

होते। इसके दो रीज़ंस हैं। एक तो ये कि

2:12

स्पों्सर्स को लगता है कि रफ्तार जो

2:14

कंटेंट बनाता है वो बहुत खतरनाक होता है।

2:16

इसलिए वो हमसे दूर रहते हैं। और दूसरा

2:18

हमें भी उनके करीब जाते हुए खतरा महसूस

2:21

होता है। तीसरा मोनेटाइजेशन। पाकिस्तानी

2:23

कंटेंट को जो रेट्स मिलते हैं बहुत कम

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होते हैं। यानी कि 1000 व्यूज पे कोई 200

2:28

₹250। और दूसरा मसला यह है कि जिस तरह का

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कंटेंट हम बनाते हैं वो कंटेंट बनाना बहुत

2:33

मुश्किल होता है क्योंकि उसमें बहुत मेहनत

2:35

लगती है, रिसर्च करनी पड़ती है, किताबों

2:37

को छानना पड़ता है। इसलिए हम डेली

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ब्लॉगर्स की तरह रोजाना की दो-दो तीन-तीन

2:42

वीडियोस अपलोड नहीं करते। ये तो थे तीन

2:43

रिवायती ऑप्शंस लेकिन एक चौथा ऑप्शन भी है

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आप। इसलिए अब रफ्तार पेट्रियों पर भी जा

2:50

रहा है। जहां आप हमारे न्यूज़ रूम का

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हिस्सा बन सकते हैं। आप देख सकते हैं कि

2:55

हम कैसे टॉपिक्स चूज़ करते हैं, रिसर्च

2:57

करते हैं, आपस में लड़ते हैं। कीमे के

3:00

समोसे खाते हैं और सबसे गैर अहम चीज यह कि

3:04

मुझ नाचीज से भी आप मुलाकात कर सकेंगे। हर

3:07

चीज की एक कीमत होती है और सच की भी एक

3:10

कीमत है जो रफ्तार पिछले कई सालों से अदा

3:13

कर रहा है। लेकिन हमें अब आपके साथ की

3:16

जरूरत है।

3:18

किसी भी वाक्य को उसके कॉन्टेक्स्ट के

3:20

बगैर नहीं समझा जा सकता। इसलिए रफ्तार की

3:23

हमेशा ये कोशिश होती है कि वो रिसर्च करके

3:25

अपने नाजरीन को उन तमाम हालात से भी जरूर

3:28

आगाह करें जिसके दौरान ये तारीकी वाक्यात

3:30

हुए। यह वो जमाना था जब हिंदुस्तान में

3:32

शुद्धि तहरीक यानी मुसलमानों और मसीहों को

3:35

जबरदस्ती हिंदू बनाने की कोशिशें जोरों पर

3:38

थी। यह वही तहरीक है जो घर वापसी जैसे

3:41

खुशनुमा नाम के साथ आज भी जारी है।

3:43

घर वापसी का कार्यक्रम यहां भी चलाया

3:45

जाएगा बिहार में। बृहद स्तर पर पूरे देश

3:47

के अंदर चलाया नहीं जाएगा चल रहा है। पहले

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से चल रहा है।

3:52

मगर 100 साल पहले की शुद्धि तहरीक बहुत

3:55

जारेहाना थी। इस्लाम की मुकद्दस शख्सियात

3:57

और शायर इस्लाम पर नाकाबिल बर्दाश्त तनकीद

4:00

की जा रही थी। और शुद्ध तहरीक के सरबराह

4:02

स्वामी शारदानांद तो ऐसे तौहीन अमेज

4:04

बयानात दे रहे थे जिससे मुसलमानों में

4:06

मुसलसल इश्तियाल बढ़ रहा था। इसी दौरान 23

4:08

दिसंबर 1926 को एक मुसलमान ने स्वामी

4:12

शारदानंद को कत्ल कर दिया। बस फिर क्या

4:14

था? हिंदुस्तान में मुसलमानों और इस्लाम

4:16

के खिलाफ एक तूफान खड़ा हो गया। भारतीय

4:19

अखबारात और रसाइल ने स्वामी शारदानंद के

4:21

कत्ल का जिम्मेदार मुलजिम अब्दुल रशीद के

4:23

बजाय तमाम मुसलमानों और इससे भी बढ़कर

4:26

इस्लाम को करार देना शुरू कर दिया। आर्य

4:29

समाज और आरएसएस जैसी सख्तगीर तंजीमों के

4:31

रहनुमाओं की तो क्या बात की जाए।

4:33

मुसलमानों के तहफुज की दावेदार कांग्रेस

4:35

के रहनुमाओं ने भी इस्लाम के खिलाफ हरजा

4:37

सराई में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कोई भी

4:40

इस वाक्य को एक कत्ल के तौर पर देखने पर

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तैयार नहीं था। यह कहा जा रहा था कि इस

4:43

कत्ल का जिम्मेदार फर्दे वाहिद नहीं बल्कि

4:46

नाउजब्लाह कुरान की तालीमात है जो

4:48

मुसलमानों को तशद्दुद पर उकसाती है। हद तो

4:50

यह है कि गांधी जैसे साइबर रॉय आदमी ने भी

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यहां तक कहा कि इस्लाम जिस माहौल में पैदा

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हुआ है इसमें फैसला ताकत पहले भी तलवार थी

4:59

और आज भी तलवार है। यह वो कशीदा हालात थे

5:02

जिनमें मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने जिहाद

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को दीन की असल रूह के मुताबिक पेश करने की

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जरूरत पर जोर दिया।

5:12

जिस वक्त सैयद अबुल आला मौदूदी ने इस्लाम

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के तसवुर जिहाद पर तहकीकी काम शुरू किया

5:17

उस वक्त वो जमीयत उलमा हिंद के रिसाले अल

5:19

जमिया के एडिटर थे। इन्होंने रिसाले के

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काम से वक्त निकालकर जिहाद पर मज़मीन लिखने

5:23

का आगाज़ किया और साथ ही साथ उन मज़मीन की

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अल जमिया में अशात भी शुरू कर दी। हर

5:28

रिसाले में मौलाना मौदूदी का जिहाद पर

5:30

मज़मून शामिल होता था। ये सिलसिला अल जमिया

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में 23 24 मज़मीन छपने तक जारी रहा। मगर जब

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मौजवाद ने तूल पकड़ा तो ये सिलसिला रोक

5:39

दिया गया। मगर सैयद मौदूदी ने किताब लिखना

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जारी रखा। यह वो वक्त था जब जमीयत

5:44

उलमा-ए-हिंद कांग्रेस की इत्तेहादी के तौर

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पर उन्हीं सियासी पॉलिसियों पर आगे बढ़ती

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जा रही थी। सैयद अबुल आला मौदूदी जमीत

5:50

उलमा हिंद की इस पॉलिसी से मुत्तफिक नहीं

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थे। इसलिए उन्होंने जून 1928 में अलजमिया

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के मुदीर के ओदे से इस्तीफा दे दिया।

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उनका कलम जो था वो गुलामी नहीं चाहता था।

6:01

वो कलम आजादी के साथ इज़हार करना चाहता था।

6:04

उन्हें बुनियादी इलाफ यही था के उलमा

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देवबंद में से जो अकाबर और उसकी कयादत

6:11

करने वाले लोग हैं उनमें एक मुस्सर तबका

6:15

कांग्रेस की हमनुवाई में इस दर्जा आगे बढ़

6:19

रहा है के उससे

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पूरी मुस्लिम उम्मत को और मुस्लिम कौम को

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नुकसान पहुंचने का एतमाल है।

6:30

इसी दौरान सैयद मौदूदी ने अपनी किताब अल

6:32

जिहाद फिल इस्लाम मुकम्मल करके दारुल

6:35

मुसनफीन को भेज दी थी। मगर किताब की अशात

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नामालूम वजूहात की बिना पर दो साल तक मौकर

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होती रही। बिल आखिर 1930 में अल जिहाद फिल

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इस्लाम किताबी शक्ल में शाया कर दी गई। इस

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किताब को दीनी और सियासी हलकों में भरपूर

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पज़ीराई मिली। अल्लामा इकबाल ने भी सैयद

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अबुल आला मौदूदी की इस पहली किताब के बारे

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में कहा कि जिहाद के मौजू पर ऐसी रिसर्च

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बेस और गैर माज़रतना किताब उर्दू तो क्या

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किसी और जुबान में भी नहीं लिखी गई है। उस

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वक़्त बर सगीर के मुमताज आलमदीन अल्लामा

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सैयद सुलेमान नदवी ने अपने रिसाल अल मारिफ

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में लिखा कि अल जिहाद फिल इस्लाम इस्लाम

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के तस्सवुर जिहाद और इसके उसूल आदाब पर एक

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शाहकार इल्मी और तहकीकी काम है। और सैयद

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अबुलला मौदूदी की इल्मी गहराई और गैर

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माज़रतखाना अंदाज काबिल तारीफ है। देवबंद

7:19

के सबसे बड़े आलिम हुसैन अहमद मदनी ने अल

7:22

जिहाद फिल इस्लाम को एक कीमती इल्मी जखीरा

7:25

करार देते हुए कहा कि सैयद मौदूदी ने

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जिहाद के तसवुर को जिस तरह वाज़ किया है वो

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वक्त की अहम जरूरत थी। कांग्रेस रहनुमा

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मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा कि जिहाद के

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मौजू पर जितनी किताबें लिखी गई हैं उनमें

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जिहाद फिल इस्लाम अपने इस्तदलाल और तरतीब

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के लिहाज से सबसे मुमताज है।

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अगरचा मौलाना मौदूदी ने अलजमिया से

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इस्तीफा जमीयत उलमा हिंद से सियासी

7:50

इख्तलाफ रिकॉर्ड पर लाकर ही दिया था।

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लेकिन इसके बावजूद उलमा देवबंद ने अल

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जिहाद फिल इस्लाम की तारीफ की थी। और कुछ

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उलमा ने तो यहां तक कह दिया था कि ये

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नौजवान उलमा देवबंद का नाम रोशन करेगा।

8:01

तमाम उलमा ने उसकी पजीराई की। उसे पसंद

8:05

किया। उसे सराहा। खासतौर पे मौलाना सैयद

8:08

सुलेमान नदवी रहमतुल्लाह अल ने उसे बहुत

8:11

पसंद किया। मौलाना मुनाज़र हसन गिलानी साहब

8:13

ने किया। जो देवबंद के अकाबर उलमा थे उन

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सब ने उसकी तहसीन फरमाई। इस ऐतबार से उलमा

8:19

देवबंद ने पूरे खुशदिली से इस्तकबाल किया।

8:23

मगर ये सुरते हाल ज्यादा अरसे बरकरार ना

8:26

रह सकी।

8:30

उस वक्त मौलाना हुसैन अहमद मदनी दारुल

8:33

उलूम देवबंद के मोहतमिम होने के साथ जमीयत

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उलमा हिंद के भी सरकरदार रहनुमा थे। जिसकी

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वजह से इनका दीनी और सियासी दोनों ही

8:41

हलकों में इन्फ्लुएंस बहुत ज्यादा था।

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दीनी हलकों में इनकी अकीदत का यह आलम था

8:45

कि मौलाना महमूद हसन जो कि मौलाना हुसैन

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अहमद मदनी के भी उस्ताद थे उन्हें शेख उल

8:51

हिंद का लकब दिया गया था। लेकिन उनके

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शागिर्द यानी हुसैन अहमद मदनी को शेख उल

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अरब व अजम कहा जाता था। मौलाना हुसैन अहमद

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मदनी साहब बहुत जैयद आलम बहुत नेक बहुत

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पाकीजा किरदार के इंसान थे।

9:07

उनके इल्मो फजल उनकी कुर्बानियों

9:10

का एतराफ ना करना बहुत ज्यादती होगी।

9:14

देवबंद ने दीन इस्लाम के लिए जो कार नुमाए

9:18

अंजाम दिए हैं उसकी मिसाल हकीकत यह है के

9:23

आलम अरब में भी नहीं मिलती। लेकिन जो चीज

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जिस फ्रेम में और जिस हद तक हुई है हमें

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उसी हद तक रखते हुए बात को ज़रे बहस भी

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लाना चाहिए। उसे उसी तक महफूज रखना चाहिए।

9:37

हुसैन अहमद मदनी की अकीदत की एक बड़ी वजह

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दारुल उलूम का माहौल भी था। जहां तलबा

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असातजा की इस तरह पैरवी करते थे जिसे आज

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के जमाने में कल्ट फॉलोविंग कहा जाता है।

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यानी मौलाना हुसैन अहमद मदनी की राय से

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इख्तलाफ करना कोई आसान काम नहीं था। बल्कि

9:53

ऐसा करना एक सख्त रद्दे अमल को दावत देने

9:56

के सिवा कुछ नहीं था। उस वक्त जमीयत उलमा

9:58

हिंद कांग्रेस की इत्तहादी थी। और इसी वजह

10:01

से तकसीम हिंद यानी कयाम पाकिस्तान की भी

10:03

मुखालिफत कर रही थी। इसे सियासी जरूरत कहे

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या कुछ और कि इसी दौरान मौलाना हुसैन अहमद

10:09

मदनी ने एक जलसे से खिताब करते हुए नजरिया

10:11

कौमियत पेश किया जिसका लुब लुबाब यह था कि

10:14

दौरे जदीद में कौम के अजाय तरकीबी भी बदल

10:18

गई हैं। और कौम की बुनियाद किसी मजहब नस्ल

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या जुबान की बुनियाद पर नहीं होगी। बल्कि

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एक जग्राफियाई हुदूद में बसने वाले

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मुख्तलिफ मजहबी इकाइयों को एक मिल्लत

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तसवुर किया जा सकता है। इसलिए हिंदुस्तान

10:32

में बसने वाले हिंदुओं, मुसलमानों,

10:34

ईसाइयों और सिखों को एक कौम तसवुर किया

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जाएगा। जिसके लिए उन्होंने मदीना में

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यहूदियों के साथ मुयदे को दलील के तौर पर

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पेश किया। इस मुआयदे में यह बात भी शामिल

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थी कि मुहदा करने वाले यहूदी कबाइल को

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नबी-ए करीम सल्लल्लाहो अलैहि वही वसल्लम

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ने महाजरीन और अंसार के साथ एक कौम करार

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दिया था। जिसमें यह बात शामिल थी कि वह

10:54

जंग की सूरत में मिलकर दुश्मन का मुकाबला

10:56

करेंगे। हुसैन अहमद मदनी ने अपनी किताब

10:59

मुत्तहदा कौमियत और इस्लाम में लिखा है कि

11:01

हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई मुत्तहदा

11:03

कौमियत की बुनियाद पर ही लड़ी जा सकती है।

11:06

मौलाना हुसैन अहमद मदनी की जानिब से

11:08

मुत्तहदा कौमियत का यह तस्सवुर सामने आया

11:10

तो इस पर सबसे पहले और जहाना तनकीद सैयद

11:13

अबुल आला मौदूदी की जानिब से सामने आई।

11:16

जिन्होंने अपने रिसाल तर्जुमान कुरान में

11:18

यके बाद दीगर एक कई मज़ामीन लिखे जो बाद

11:21

में मसला कौमियत की सूरत में किताबी शक्ल

11:23

में भी शाया हुए। सिर्फ यही नहीं कि सैयद

11:25

मौदूदी ने मौलाना हुसैन अहमद मदनी के

11:27

मुत्तहदा कौमत के तस्बुर को कतई तौर पर

11:29

मुस्तरद कर दिया बल्कि सैयद ने यह भी लिखा

11:32

कि आज मगरबी कौमों से सबक सीख कर हर ख्ते

11:35

के मुसलमान नस्लियत और वतनियत के राग अलाप

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रहे हैं। अरब अरबियत पर नाजा हैं तो

11:40

मिस्रियों को अपने फिरौन याद आ रहे हैं।

11:43

तुर्क तुर्कियत के जोश में अपना ताल्लुक

11:45

चंगेज़ खान और हलाकू खान से जोड़ रहे हैं।

11:48

हिंदुस्तान में ऐसे लोग पैदा हो रहे हैं

11:50

जो खुद को हिंदुस्तानी कौमियत से मंसूब

11:52

करते हैं। और आबे जमजम से कतई ताल्लुक

11:55

करके आबे गंगा से वाबस्तगी पैदा करना

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चाहते हैं। बाज़ लोग इस काम खयाली में भी

12:00

मुब्तला है कि वतनी कौमियत का एहसास पैदा

12:02

होने के बावजूद भी इस्लामी कौमत का रिश्ता

12:05

मुसलमानों के दरमियान मौजूद रहेगा।

12:09

जब सैयद ने मौलाना हुसैन अहमद मदनी के

12:11

तस्बुर कौमियत को इस अंदाज से मुस्तरद

12:14

किया तो गोया एक तूफान बरपा हो गया।

12:16

मौलाना मौजूदी ने मौलाना हुसैन अहमद मदनी

12:19

के एक रसाले के ऊपर तनकीदी मजमून लिखा और

12:23

कहा कि यह जो आप कह रहे हैं कि कौमेान

12:27

से बनेंग वतन की बुनियाद पे बनती है फी

12:30

जमाना बराहे करम इसे रिजू करें या इसे

12:34

इसकी वजाहत करें या इसकी इसको समझाएं उलमा

12:37

देवबंद में से एक गिरोह ने बहुत शदीद

12:41

रद्दे अमल का इजहार किया उसके अंदर हदूद

12:44

जो है वो फिर टूट उठती चली गई। जुलाई 1938

12:48

में मौलानादी के खिलाफ जम के मजमून लिखा

12:51

गया और जिसमें बड़े बद अल्फाज़ इस्तेमाल बड़े

12:55

सख्त और

12:58

गैर शरीफाना अल्फाज़ इस्तेमाल किए गए।

13:04

मगर उलमा देवबंद के लिए उस वक्त मौलाना

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मौदूदी की राय को मुस्तरद करना मुश्किल हो

13:09

गया जब अल्लामा इकबाल ने भी अपनी हिमायत

13:11

का वजन सैयद के पल्ले में डाल दिया। हुसैन

13:13

अहमद मदनी के बारे में अल्लामा इकबाल का

13:15

अंदाज तो शायद सैयद मौदूदी से कहीं ज्यादा

13:18

जानेहाना था। अल्लामा इकबाल ने मौलाना

13:20

हुसैन अहमद मदनी का नाम लेकर मुत्तहदा

13:23

कौमियत के तसवुर को मुस्तरद कर दिया।

13:25

अल्लामा इकबाल ने कहा कि अजम अब तक दीन के

13:28

रमूस को नहीं समझ सका है। इसलिए देवबंद के

13:31

हुसैन अहमद ने ऐसी अजीब बात की है। मिरर

13:34

पर बैठकर यह नगमा सुनाया कि कौम वतन से

13:36

बनती है। यह मोहम्मद अरबी सल्लल्लाहु

13:38

अलैहि वही वसल्लम के मुकाम से बेखबरी की

13:41

बात है। यह नाम ही इसी चीज का है कि अपने

13:43

आप को मुकाम मुस्तफा तक पहुंचाया जाए। अगर

13:46

तू उन तक ना पहुंच सका, तो फिर सब कुछ अबू

13:49

लहबी है। सब कुछ अबू लहबी है। अल्लामा

13:52

इकबाल का यह कता रिसाला मगजन में शाया हुआ

13:55

था। जिसने आवाम नास में गोया इस बहस का

13:57

फैसला ही कर दिया था। मुमताज रिसर्च

14:00

स्कॉलर जामा कराची में और शोबा उसूल दीन

14:02

के प्रोफेसर मौलाना शफी चितराली के

14:04

मुताबिक मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने तो

14:06

सिर्फ यह कहा था कि जिस तरह मिसाक मदीना

14:09

में यहूदियों के साथ इस्तराक अमल किया

14:12

गया। उसी तरह हिंदुस्तान में भी गैर

14:14

मुस्लिम अकवाम से मुहायदा करके मुसलमानों

14:17

का मफाद बचाया जा सकता है।

14:19

मौलाना हुसैन मदनी ने एक जलसे से खिताब

14:22

करते हुए यह बात की थी के आज के दौर में

14:27

नेशन स्टेट का तसवुर दुनिया में है और इसी

14:31

तसवुर के तहत दुनिया में हुकूमतें बन रही

14:34

रियासतें बन रही हैं। तो हम भी इस तसवुर

14:37

के तहत कोई मुश्तका हम हुकूमत बना सकते और

14:41

अगले दिन बाज अखबारात ने उनकी उस तकरीर का

14:46

को रिपोर्ट इस तरह से किया जैसे मौलाना

14:48

हुसैन मदनी ये कह रहे हैं कि

14:52

कौमे जो है वो वतन से बनती है मजहब से

14:54

नहीं। अल्लामा इकबाल को ये बात बताई गई।

14:58

मौलाना मदनी की तरफ से उनको यह पैगाम दिया

15:01

गया कि मैंने जो बात की थी वो यह बात थी

15:04

और मैंने यह बात नहीं की है कि कौमे वतन

15:06

से बनती हैं। तो उन्होंने उसको कबूल किया।

15:09

लेकिन बहरहाल अल्लामा इकबाल की उस दौरान

15:12

वफात हो गई और उनका जो नक्त नजर था वो

15:15

निसाक मदीना के तसवुर के ऊपर मनी था। उसके

15:18

ऊपर चल के हम हिंदुस्तान के अंदर भी कोई

15:21

रियासत कायम कर सकते हैं।

15:24

मगर ये बात इतनी सादा नहीं थी। मौलाना

15:27

हुसैन अहमद मदनी की किताब मुताहिदा कौमियत

15:29

और इस्लाम में एक बाप इस मौजू पर बांधा था

15:32

कि मुताहिदा कौम और उम्मते जनाबे रसूल

15:34

अल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने खुद

15:37

बनाई थी जो मुसलमानों के साथ गैर

15:39

मुस्लिमों पर भी मुश्तमिल थी। जिस पर सैयद

15:41

अबुल आला मौदूदी ने यहां तक कहा कि मिसाके

15:44

मदीना का एक फिकरा ही मौलाना हुसैन अहमद

15:47

मदनी के हाथ आ गया है कि बनी औफ के यहूदी

15:49

मुसलमानों के साथ एक उम्मत होंगे। इस

15:52

फिकरे को यह दावा करने के लिए काफी समझ

15:54

लिया गया है कि आज भी मुसलमानों और गैर

15:56

मुस्लिमों की मुत्तहदा कौमियत बन सकती है।

15:59

अरबी के लुगवी मायनों में उम्मत से मुराद

16:01

वो जमात होती है जिसे कोई चीज जमा करती

16:04

है। इसलिए किसी मुस्तिक मकसद के लिए आरजी

16:07

तौर पर मुत्तफिक होने वाले गिरोह को किसी

16:09

भी तरह कुरान की इस्तिलाई मायनों में एक

16:12

उम्मत नहीं कहा जा सकता। सैयद बौदूदी ने

16:15

यह भी लिखा कि जमीयत उलमा का असेंबली और

16:18

काउंसिलों में शिरकत को एक दिन हराम और

16:20

दूसरे दिन हलाल करार देने की वजह भी कोई

16:23

इदराक नहीं है। बल्कि ये फतवे भी गांधी जी

16:26

की जुबिश लब के साथ हरकत करते हैं।

16:30

मौलाना मौदूदी और अल्लामा इकबाल के ऐसे

16:32

दलाइल सामने आने के बाद मुस्लिम आवाम की

16:35

अक्सरियत की जानिब से मौलाना हुसैन अहमद

16:37

मदनी के मुत्तहदा कौमियत के तसवुर को

16:39

पजीराई नहीं मिल सकी। मौलाना शफी अहमद

16:42

चित्राली के मुताबिक ऐसा नहीं था कि हुसैन

16:44

अहमद मदनी की कौमियत से मुतालिक राय दलाइल

16:47

के ऐतबार से दुरुस्त नहीं थी। बल्कि दो

16:49

अवामिल ऐसे थे जिसकी वजह से मुसलमानों की

16:52

अक्सरियत ने अबुल आला मौजदूदी और अल्लामा

16:55

इकबाल की राय को ज्यादा कबूलियत बखशी। ये

16:57

कोई कुफ्र और इस्लाम का इख्तलाफ नहीं था।

17:00

एक इल्मी और इ्तहादी मसला था। तारीख तौर

17:03

पर इसका इंकार नहीं किया जा सकता कि जो

17:06

दोमी नजरिए की तहरीक थी उसमें ऐसी दिलकशी

17:10

थी उसमें ऐसी एक लोगों के लिए जो है वो

17:12

उसमें एक करिश्मा था के लोग दीवाना वार

17:16

उसके हक में चले गए मुसलमानों की अक्सरियत

17:19

उस तरफ चली गई यही वो मरहला था जहां

17:21

मुस्लिम लीग को तकवियत भी मिलना शुरू हो

17:23

गई उसकी वजह ये थी कि जो कांग्रेस की

17:26

हुकूमतें बनी उन हुकूमतों में मुसलमानों

17:28

के साथ जो हिंदुओं का रवैया था वो रवैया

17:33

मुनासिब नहीं था। वो तासुब की बुनियाद पे

17:35

उन्होंने फैसले करने शुरू कर दिए।

17:40

वैसे आगे बढ़ने से पहले हम अपने जजीसी

17:42

नाजरीन को यह बताना चाहते हैं कि आज के

17:44

उर्दू अखबारात में शाया होने वाले कत तो

17:47

शायद इतने सियासी असरात नहीं रखते। मगर उस

17:50

जमाने के अखबारात में जब इकबाल का कोई कता

17:52

शाया होता तो वह महज शायरी नहीं होता था।

17:55

बल्कि वो मुसलमानों की फिक्री रहनुमाई के

17:57

साथ-साथ एक पॉलिसी स्टेटमेंट भी होता था।

18:00

और इस पॉलिसी स्टेटमेंट के बरे सखीर की

18:02

सियासत पर गहरे असरात होते थे। हमारे आज

18:04

के नौजवानों को अल्लामा इकबाल की शायरी

18:06

बहुत मुश्किल लगती है। मगर आज से 100 साल

18:08

पहले अल्लामा इकबाल का कलाम जब छपता था तो

18:11

वो पैगाम ना सिर्फ मुसलमानों की अक्सरियत

18:13

तक पहुंचता था बल्कि समझा भी जाता था।

18:15

हालांकि कायम पाकिस्तान से पहले तक

18:17

हिंदुस्तान में ख्वादिगी की शरा सिर्फ 12स

18:20

थी और मुसलमानों में यह शरा 8% यानी सिंगल

18:24

डिजिट में थी। लेकिन इसके बावजूद

18:26

मुसलमानों में इकबाल को समझा जा रहा था।

18:28

आज पाकिस्तान में ख्वादिगी की शरा तो 63%

18:31

है। लेकिन इकबाल की समझ शायद 8 फीसद शराए

18:34

खानंदगी वाली भी नहीं रही है। इन बातों का

18:36

इस डॉक्यूमेंट्री में जिक्र करना इसलिए भी

18:38

जरूरी है कि हमारे नाज़रीन जान सके कि उस

18:41

वक्त इन्फ्लुएंस के टूल्स सोशल मीडिया और

18:43

टीवी नहीं थे बल्कि किताब, शायरी, तकरीर

18:46

और मिसाले थी। ऐसा नहीं है कि अल्लामा

18:49

इकबाल ने यह बात सिर्फ एक बार कही थी।

18:51

बल्कि यह शेर तो आज तक जुबाने ज्यादा आम

18:54

है कि अपनी मिल्लत पर कयास अकवामे मगरिब

18:57

से ना कर खास है तरकीब में कौमे रसूल

19:00

हाशमी

19:02

अल्लामा इकबाल ने वतनियत एक सियासी तसवुर

19:05

वाली नज़म में इस बात को यह कहकर मज़द वाज़

19:08

किया है कि इन ताजा खुदाओं में बड़ा सबसे

19:11

वतन है। जो पैराहन इसका है वो मिल्लत का

19:14

कफ़न है। ये बुत के तराशीदा तहजीब नवी है।

19:18

गारत करे काशाने दीन नबवी है। बाजू तेरा

19:22

तौहीद की कुत से कवी है। इस्लाम तेरा देश

19:25

है। तू मुस्तफी है। इस्लाम तेरा देश है।

19:29

तू मुस्तफी है। तू मुस्तफी है। मसला

19:33

कौमियत पर इकबाल और मौदूदी तो एक पेज पर

19:35

थे ही। लेकिन क्या तमाम उलमा देवबंद भी

19:38

मुत्तहदा कौमियत पर मौलाना हुसैन अहमद

19:40

मदनी के हम ख्याल थे। दरअसल मौलाना हुसैन

19:43

अहमद मदनी का ओरा इतना बड़ा था कि बहुत

19:46

सारे लोग आज भी यह समझते हैं कि जैसे पूरा

19:49

देवबंद ही इनके मुत्तहदा कौमत के नजरिए का

19:52

आलमरदार था। लेकिन ऐसा नहीं था। मुत्तहदा

19:55

कौमियत के मामले पर सिर्फ वो उलमा ही

19:57

मौलाना हुसैन अहमद मदनी के साथ थे जो

20:00

जमीयत उलमा-ए-ह हिंद में फाल थे। देवबंद

20:02

मकतबाबे फिक्र के कई नुमाया उलमा ने उस

20:04

वक्त भी तसवुर कौमियत पर मौलाना हुसैन

20:07

अहमद मदनी का साथ नहीं दिया था। यह कहना

20:09

कि सबने किया यह नहीं ठीक। इसलिए कि

20:12

मौलाना हुसैन मदनी साहब के उस तसवुर के

20:16

उन्हीं के साथ रहने वाले लोगों में मौलाना

20:18

शब्बीर अहमद उस्मानी साहब उसके कायल नहीं

20:21

थे। मौलाना मुफ्ती मोहम्मद शफी साहब हुसैन

20:25

अहमद मदनी साहब के उस मौकफ के कायल नहीं

20:27

थे। अकेले मौलाना मौजूद ने इख्तलाफ नहीं

20:30

किया। खुद देवबंद के अकाबर उलमा ने उनसे

20:33

इख्तलाफ किया।

20:34

देवबंद के ये उलमा कौमियत और तकसीम हिंद

20:36

के मामले पर मौलाना अशरफ अली थानवी के हम

20:39

ख्याल थे। जिसकी तफसील आप हमारी इस

20:41

डॉक्यूमेंट्री में देख सकते हैं। मौलाना

20:43

हुसैन अहमद मदनी की अल्लामा इकबाल और

20:45

मौलाना मौजदूदी से कौमियत की बहस एक बड़ा

20:48

सियासी वाकया था। पाकिस्तान बनने के साथ

20:50

सियासी तौर पर ये बहस खत्म हो गई। मगर

20:52

नजरियाती तौर पर ये बहस आज भी किसी ना

20:55

किसी अंदाज में चलती रहती है। मेरी नजर के

20:57

अंदर ये जो बहस थी ये बहस दो कौमी नजरिए

21:02

की जो बहस है ये कयाम पाकिस्तान के बाद ये

21:04

बहस जो है वो खत्म हो गई। मौलाना हुसैन

21:07

मदनी ने अपना इख़्तलाफ यह कहकर खत्म कर

21:10

दिया था कि मस्जिद बनने से पहले तो

21:12

इख़्तलाफ हो सकता है कि मस्जिद बननी चाहिए

21:15

या नहीं बननी चाहिए। लेकिन जब बन गई तो अब

21:17

वो मुकद्दस है। इस बहस का इससे बेहतर और

21:20

खूबसूरत अंदाज में खात्मा नहीं हो सकता।

21:23

मौलाना मौदूदी की जानिब से मौलाना हुसैन

21:24

अहमद मदनी की राय को इस अंदाज में मुस्तरत

21:26

करने से देवबंद मकतबा फिक्र शायद हमेशा के

21:29

लिए मौलाना मौदूदी से शाकी हो गया।

21:31

क्योंकि इसके बाद कई नाम और उलमा देवबंद

21:34

ने ना सिर्फ अपनी तकारीर में सैयद को

21:35

तनकीद का निशाना बनाया बल्कि उलमा इकराम

21:38

ने इनके खिलाफ दर्जनों किताबें भी लिखी।

21:40

अगरचा वक्त गुजरने के साथ-साथ यह तनकीद कम

21:42

हो गई है। मगर यह सिलसिला किसी ना किसी हद

21:45

तक आज भी जारी है।

21:47

अगर मौदूदियत का फितना उठा तो हमारे उलमा

21:51

इकराम ने उम्मते मुस्लिम की चौकीदारी का

21:55

हक अदा किया। मुफ्ती मोहम्मद शफी, हकीम

21:57

मोहम्मद अख्तर, मौलाना मोहम्मद जिक्रिया,

21:59

मौलाना यूसुफ लुधियानावी और हमारे आज के

22:02

मुफ्ती तकी उस्मानी तक सब ही इस कार इलाफ

22:05

में अपना हिस्सा डाल चुके हैं।

22:07

मौलाना के खिलाफ ऐसी जुबान इस्तेमाल हुई

22:09

है कि जिसके ऊपर मेरा ख्याल है कि खुद

22:14

उलमा जो हैं जिन्होंने वो अल्फाज़ इस्तेमाल

22:17

किए वो भी अगर सोचेंगे तो उन्हें एहसास

22:20

होगा कि ज्यादती की है।

22:25

खिलाफत और मलूकियत बर सखीर की तारीख की उन

22:27

किताबों में शामिल है जिन पर सबसे ज्यादा

22:29

बहस हुई है और इस किताब के खिलाफ शायद

22:32

सबसे ज्यादा किताबें लिखी गई हैं और इन

22:35

किताबों में मौलाना असलाउद्दीन यूसुफ की

22:37

खिलाफत और मलूकियत की तारीखी और शरई

22:39

हैसियत मुफ्ती तकी उस्मानी की हजरत माविया

22:42

और तारीखी हकायक भी शामिल है। खिलाफत और

22:44

मलूकियत में सैयद मौदूदी ने उन हालात और

22:46

आवामिल का जायजा लिया है। जिनकी वजह से

22:48

खिलाफत राजदा बदतरीज मलूकियत में बदल गई।

22:51

जैसा कि कौमत की बहस के दौरान यह नुक्ता

22:53

सामने आया था कि मुतहिदा कौमत का तसवुर

22:56

जमीयत उलमा हिंद की सियासी जरूरत भी थी।

22:58

इसी तरह उलमा देवबंद का यह ऐतराज भी बेवजन

23:01

नहीं है कि किताब में एक खास स्लूब और

23:04

अंदाज इख्तियार किया जाना शायद सैयद अबुल

23:06

आला मौदूदी की भी सियासी जरूरत थी। मौलाना

23:09

मौदूदी साहब ने अपनी जो इकामत दीन का एक

23:13

ढांचा तशकील दिया और एक इस्लामी हुकूमत का

23:16

जो एक तसवुर उन्होंने पेश किया और

23:18

उन्होंने गोया कि एक कसौटी बना ली कुरान

23:21

और हदीस के अपने मुताले की रोशनी में और

23:23

फिर उन्होंने उस कसौटी के ऊपर जो है वो

23:26

शख्सियात को उस पे परखा और जिन शख्सियात

23:29

को उसमें परखा उसमें वो शख्सियात भी आ रही

23:32

थी कि जिनको कुरानी शख्सियात कहा जाता है

23:34

सबा इकराम मौलाना मौदूदी साहब का जो अंदाज

23:37

था वो अंदाज थोड़ा थोड़ा सा मुख्तलिफ था।

23:39

महसूस हुआ कि जैसे मौलाना मौदूदी साहब जो

23:42

है वो जज हैं और तारीख शख्सियात हैं। वो

23:46

उनके सामने जो है वो कटेरे में खड़े हैं।

23:50

इब्तदा में तो खिलाफत और मलूकियत पर उलमा

23:52

की तनकीद बहुत जानेहाना थी। मगर इसके बाद

23:55

मौलाना मौदूदी ने अपनी तहकीक का यह पहलू

23:57

सामने रखा कि खिलाफत और मलूकियत में जो

24:00

कुछ भी लिखा गया है वो इन तमाम किताबों से

24:02

ही नकल किया गया है जो दारुल उलूम देवबंद

24:05

समेत दीनी मदारिस में सदियों से पढ़ाई जा

24:08

रही है। बल्कि सनद के तौर पर किताबों के

24:10

हवाले और सफा नंबर तक हाशिए में पेश कर

24:12

दिए गए। जिन चंद जुमलों के ऊपर शदीद एतराज

24:16

है पूरी किताब के बारे में कोई नहीं है।

24:19

दो या तीन जगह पे दो-तीन जुमलों के बारे

24:21

में एक बात करके वो पूरी कहानी जो है और

24:25

पूरा एक थीसिस जो है ये पेश किया गया है।

24:28

तो जब हम उलमा देवबंद ही की किताबों को

24:31

देखते हैं तो उससे ज्यादा सख्त अल्फाज़ के

24:34

अंदर उन्होंने बेशुमार जगह पे चीजें लिखी

24:37

है। लेकिन ये अकाबर परस्ती और आवा परस्ती

24:39

का वो मर्ज है कि जिसके नतीजे में तनकीद

24:43

करने वाले उन हजरात ने अपने शतीर जो थे

24:46

उनको भुला दिया और इस सिनके को शतीर बना

24:49

दिया।

24:52

वक्त के साथ-साथ खिलाफत और मलूकियत पर

24:54

एतराजात की नौयत भी बदलती गई। पहले जो

24:56

ऐतराज मंदरजात पर था वो किताब के असलूप की

24:59

तरफ चला गया। लेकिन वक्त के साथ-साथ

25:01

खिलाफत और मलूकियत पर तनकीद की नौयत ही

25:04

नहीं बल्कि शिद्दत में भी कमी आती गई और

25:06

इसके बहुत सारे असबाब में से एक सोशल

25:08

मीडिया भी बना है। जहां इल्मी बहस के तमाम

25:11

पहलू सामने आने से खिलाफत और मलूकियत का

25:13

तासुर भी बदल गया है। बदकिस्मती कि ये

25:16

मुर्गा जो मलूकियत के एजेंट है ना

25:18

इन्होंने उनको बदनाम किया। कसम ले लीजिए

25:20

कुरान पढ़ के मौजी कोई किताब नहीं पढ़नी।

25:22

बताओ जो किताब पढ़ते ही नहीं। उन जालिमों

25:24

को क्या हक है फैसले करने का कि तौहीन

25:26

कीजिए। 1400 साल में इस तरह की मेहनत की

25:30

यूनिक मिसाल किसी और की नहीं मिलती और वो

25:33

है मौलाना मौजूदी रहमतुल्लाह और वो उनकी

25:36

किताब है खिलाफत और मलूकियत मैं इसको कहता

25:38

हूं ये इल्मी एटम बम है इस तरह की आरा

25:41

सामने आने से खिलाफत और मलूकियत का वो

25:43

तासुर तो कमजोर हो गया है जो लोग सिर्फ

25:45

अपने मकतब फिक्र के उलमा की राय की

25:47

बुनियाद पर बनाया करते थे लेकिन इस पेशरफ

25:50

का एक कमजोर पहलू ये भी है ये तासुर मुताल

25:53

के बजाय बयानात की वीडियो की बिना पर कायम

25:56

होता है| मौजूदा जमाने में खिलाफत मुलकियत

25:59

के हक में कोई ज्यादा चीज है और मुखालफत

26:02

में नहीं। लोग जो है वो चीजों को ज्यादा

26:05

गौर से पढ़े बगैर भी कई चीजें कर रहे हैं।

26:08

जितनी संजीदगी के साथ माजी में देखा जाता

26:11

था इल्मी रवायत ज्यादा मजबूत थी। नए दौर

26:15

में इंटरनेट पे और सोशल मीडिया पे इनसार

26:18

ज्यादा हो गया है और चीजों को सरसरी अंदाज

26:21

से देखने की बीमारी में लोग मुब्तला है।

26:25

चाहे कौमियात जैसी सियासी बहस हो या

26:27

खिलाफत मलूकियत की सूरत में तारीख वाक्यात

26:29

के जायजे का मामला। ये मकाल इल्मी और

26:31

नजरियाती थे। मौलाना मौदूदी हो या मौलाना

26:33

हुसैन अहमद मदनी ये दोनों शख्सियात अपने

26:36

किरदार से तारीख में अपना मुकाम मुतयन कर

26:39

चुकी हैं।

26:39

अब उससे आगे बढ़ना चाहिए। 100 साल हो रहा

26:42

है। अ 90 साल पुरानी बातें हैं। ये मौलाना

26:46

मौदी से मोहब्बत रखने वाले हो। हुसैन मदनी

26:50

रहमतुल्लाह अल उनसे वालहाना मोहब्बत रखने

26:53

वाले हो। आने वाले चैलेंज में एक ही पेज

26:56

पे है। एक ही नयत की आग जो है उसकी तपश

26:59

महसूस कर रहे हैं। उम्मत जो है और नई नस्ल

27:02

जो है उनसे पूछती है कि आने वाले कल के

27:06

लिए रास्ता क्या है?

27:13

ओम

27:25

Interactive Summary

यह वीडियो सैयद अबुल आला मौदूदी के जीवन और उनके विचारों के विकास पर आधारित है, विशेष रूप से मौलाना मोहम्मद अली जौहर के जिहाद पर दिए गए एक भाषण से प्रेरित होकर उनके लेखक बनने की यात्रा। वीडियो मौदूदी और देवबंद के उलमा (विशेष रूप से मौलाना हुसैन अहमद मदनी) के बीच 'मुत्तहदा कौमियत' (संयुक्त राष्ट्रवाद) और 'खिलाफत और मलूकियत' जैसे विषयों पर हुए वैचारिक मतभेदों और बहसों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे उस समय के राजनीतिक हालात, जैसे कि शुद्धि तहरीक और भारत विभाजन, ने इन तर्कों को प्रभावित किया। अंत में, वीडियो आज की पीढ़ी के लिए इन ऐतिहासिक बहस से ऊपर उठकर वर्तमान चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने का संदेश देता है।

Suggested questions

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