The Untold Story Of How PPP Destroyed Karachi (Watch It Before Something Happens To It)
853 segments
कराची किसने तबाह किया? कराची किसने?
पीपी पार्टी, पीपल्स पार्टी, पीपल्स
पार्टी, पीपल्स पार्टी, पीपल्स पार्टी।
इस सवाल का तो सब यही जवाब देते हैं।
लेकिन मसला यह है कि आज तक किसी ने यह
नहीं बताया कि पीपल्स पार्टी ने आखिर
कराची तबाह किया कैसे?
तो बस इसी का जवाब देने के लिए मैं आज ये
डॉक्यूमेंट्री बना रहा हूं। तो चल बिना
किसी तम्मीद के शुरू करते हैं। वैसे एक
सेकंड पहले एक बात तो बताएं कराची की
आबादी कितनी है?
2 करोड़ 10 लाख ढाई करोड़
3 करोड़ जो कि है जिसका मैं चैलेंज करता
हूं। मुल्क के सबसे बड़े शहर का सबसे बड़ा
अलमिया यह है कि आज तक हमें पता ही नहीं
है कि कराची में कितने लोग बसते हैं। और
यही इसकी तबाही की सबसे बड़ी वजह है। तो
चलें लाइक और सब्सक्राइब कर लें ताकि मैं
बकायदा शुरू कर सकूं कराची की तबाही की
कहानी। अच्छा यहां एक अहम बात अमूमन
रफ्तार को लोग सराते हैं कि हम इसी तरह
बिना डरे तहकीकाती डॉक्यूमेंट्री के जरिए
ताकतवर लोगों को जवाबदे ठहराते हैं। लेकिन
आपको बताऊं यह सब मुमकिन नहीं अगर आप हमें
सपोर्ट ना करें। क्योंकि जाहिर है इस तर्ज
का काम स्पॉनसरशिप और फंडिंग के जरिए तो
मुमकिन ही नहीं। तो अगर आप चाहते हैं कि
रफ्तार इसी तरह इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म को
मुल्क में जिंदा रखे तो पेट्रियों पर
हमारी सपोर्ट का हिस्सा बने। [संगीत]
अच्छा इससे पहले कि मैं आपको बताऊं कि
कैसे पीपल्स पार्टी ने कराची को तबाह
किया। आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं। एक
बात तो बताएं कि पीपल्स पार्टी की तो सिंध
में हुकूमत पहले भी रही है। 1972 से 77
तक, 88 से 90 और फिर 93 से 96 तक। लेकिन
उन अद्वार में कराची ना सिर्फ पाकिस्तान
का बल्कि इस ख्ते का सबसे तरक्कीफ्ता
शहरों में शुमार होता था। यानी दिल्ली,
मुंबई और कोलकाता जैसे शहर भी कराची से
बहुत पीछे थे। तो तब मामला उलट क्यों था?
[संगीत]
[घंटी की आवाज़] चले परेशान मत हो। मैं ही
बता देता हूं। दरअसल उन सब अदब में एक चीज
आज से मुख्तलिफ थी। जब वफाकी हुकूमते
सूबों के मामले में लाचार, बेख्तियार और
बेबस नहीं हुआ करती थी। क्यों? क्योंकि जब
18वीं तरमीम नहीं थी। तब वफाकी हुकूमते
तमाम बड़े शहरों की तरक्की पर नजर रखती
थी। उनके लिए मंसूबे बनाती और उन्हें
मुकम्मल करती थी। क्योंकि उन्हें अंदाजा
था कि मुल्क का इमेज मुतायन करने में बड़े
शहरों के इंफ्रास्ट्रक्चर का किरदार अहम
होता है। क्या हुआ? यकीन नहीं आ रहा। चल
आपको एक दिलचस्प बात बताता हूं। क्या आप
जानते हैं शाह फैसल लियाकताबाद फ्लाईओवर
और लियाकताबाद सुपर मार्केट समेत कराची के
बहुत सारे मंसूबे वफाकी हुकूमत के थे। चल
यह भी छोड़ें। आपको आपके ही सबसे ज्यादा
कहे और सुने जाने वाले इस जुमले से समझाता
हूं। यह तो आपने सुना ही होगा कि कराची
में आखिरी बार काम मुस्तफा कमाल के दौर
यानी मुशर्रफ दौर में हुआ था। जानते हैं
उस वक्त भी 18वीं तरमीम नहीं थी।
हमने दो सालों में इस कराची में इतना काम
किया कि आप 60 सालों के कामों को कंपेयर
नहीं कर सकते।
मुशर्रफ साहब ने ये किया कि उन्होंने ताकि
आवाम को रिलीफ मिले। एक डिक्टेटर की ये
ख्वाहिश होती है कि लोगों में सियासी
बेचैनी ना हो। तो उसने फिर एक सिस्टम दे
दिया कि जी लोकल गवर्नमेंट को ज्यादा से
ज्यादा उन्होंने इख्तियारात दिए जिसमें
तालीम सेहत [संगीत] जमीनों का जो रिकॉर्ड
फिर बिल्डिंग कंट्रोल मास ट्रांजिट
[संगीत] ट्रांसपोर्ट ये सारे काम जो कि
लोकल लेवल पे होने चाहिए पानी का बंदोबस्त
वाटर [संगीत] एंड सीवरेज ये उन्होंने लोकल
गवर्नमेंट को इख्तियारात दे दिए एक
पावरफुल मेयर हर शहर में आप उस जमाने का
देखें कि कितना तेजी से काम हुआ
29 बिलियन रूपीस का तामीर कराची का
पाकिस्तान की तारीख में कराची की तारीख
में पहली दफा वो वो डेवलपमेंट वर्क्स का
पैकेज तैयार हुआ जिसमें 6 अरब रुपए बोले
जो है वो फेडरल गवर्नमेंट को उन्होंने कहा
कि फेडरल गवर्नमेंट दे पांच अरब जो है
प्रोटशियल गवर्नमेंट दे 6 अरब रुपए जो है
वो सिटी गवर्नमेंट दे और बकिया 12 अरब जो
है वो स्टेक होल्डर दें
लेकिन फिर आता है कहानी में ट्विस्ट अगर
आपने सिंध सरकार वाली हमारी ये
डॉक्यूमेंट्री देखी है तो आप जानते होंगे
कि 2010 में सदर जरदारी ने एक ऐसा काम
किया जो अमूमन आप पाकिस्तानी सियासतदान से
एक्सपेक्ट नहीं करते। उन्होंने
पार्लियामेंट के बगैर मांगे तमाम ताकत
पार्लियामेंट और सूबों को दे दी और यह वो
मास्टर स्ट्रोक था जिसने सुबह सिंध की
पावर डायनामिक्स ही बदल दी।
रिलेशन वंस अगेन बी ड्रिवन बाय सेंस ऑफ़
पर्पस।
इसके नतीजे में नेशनल पॉलिटिक्स तो पीवी
के हाथ से निकल गई। लेकिन सुबह सिंध पे
सरदारी राज ने पंजे गाड़ लिए।
[संगीत]
[संगीत]
कि जब बारिश आता है तो पानी आता है। जब
ज्यादा बारिश आता है तो ज्यादा पानी आता
है। इस्लामाबाद ऐसा है, लाहौर ऐसा है,
कराची ऐसा है।
मैं आज तुम्हें वार्म कर रहा हूं। तुम
18वीं तरमी को मत चेरो। तुम 18वीं तरमी
खत्म करने की कोशिश करो। वन यूनिट लागू
करने की कोशिश करो। मैं एक लात मारकर आपका
हुकूमत खत्म कर दूंगा।
अब डॉक्यूमेंट्री का एक इंतहाई अहम मोड़।
अगर हमें कराची की तबाही को समझना है तो
हमें सुबह सिंध पर पीपल पार्टी के राज को
समझना होगा। क्यों? क्योंकि यहीं से कराची
की तबाही जुड़ी है।
[संगीत][गाना गाने की आवाज़]
देखिए 18वीं तरमीम के बाद अब सूबों के पास
ताकत भी थी, इख्तियारात भी और बेपनाह
फसाइल भी। लेकिन गौर किया जाए तो यह
इख्तियारात ता हयात पीपल्स पार्टी को नहीं
मिले थे क्योंकि यह सब विजारतें आला के
थे। और इस बात की क्या गारंटी के अगली बार
भी सुबह सिंध में हुकूमत पीपल्स पार्टी की
तो राज को पक्का करने के लिए सबसे अहम
होता है कि खतरात को एक-एक करके एलिमिनेट
किया जाए। क्या ही अच्छा हो कि अगर कराची
की सीटें ही कम हो जाए। कराची से एक भी
सीट ना जीतें। फिर भी अंदरून की सीटें
इतनी ज्यादा हों कि वज़र एआला हमेशा हमारा
ही बने। अगर इससे पहले कि पीपल्स पार्टी
इसके लिए कुछ करती यह तोहफा इन्हें विफाकी
हुकूमत ने दे दिया।
कराची की आबादी जो मास ट्रांजिट प्लान
देने वाली जापानी एजेंसी जाइका के मुताबिक
2010 में ही 1 करोड़ 80 लाख थी। माहिर
डेमोग्राफर्स के मुताबिक जिसे 2017 में 2
करोड़ 25 लाख के आसपास होना था। जानते हैं
2017 की मर्दम शुमारी में कराची की आबादी
कितनी निकली।
[संगीत]
1 करोड़ 60 लाख। जी बिल्कुल आपने ठीक
सुना। यही नहीं आपको बताऊं कि इसके बाद एक
मर्तबा फिर सेंस हुई जो कि पाकिस्तान की
तारीख की पहली डिजिटल सेंसेस थी। इससे
माहरीन को उम्मीदें थी कि अब तो
टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है। अब
कराची के हर शहरी को गिन लिया जाएगा।
जानते हैं अब यह नंबर कितना बना? सिर्फ 2
करोड़। हालांकि माहरीन के मुताबिक अगर
सिर्फ उस वक्त के इलेक्ट्रिक के कराची में
मौजूद 37 लाख मीटर्स को ही एवरेज पर मीटर
छह अफराद से मल्टीप्लाई कर दिया जाए तो
आबादी तकरीबन सवा दो करोड़ बनती है। और
हां जिसमें अभी 30 से 40% कच्ची आबादी
शामिल ही नहीं। खैर, अब सवाल यहां ये बनता
है कि क्यों आखिर कराची की आबादी चाहे
टेक्नोलॉजी हो या ना हो कम ही सामने आती
है।
ये ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक की फिगर है। ये
प्लानिंग कमीशन के जो डिपार्टमेंट है
मोहकमा है ये उसकी अपनी फिगर्स हैं कि
उन्होंने पूरे पाकिस्तान में उस वक्त
आइडेंटिफाई किया था कि 400 ऐसी हाई राइज
हैं जिसमें से जिसमें लोग या तो गए नहीं
है और अगर गए हैं तो अगर फर्ज करें कि 10
मिंज इमारत है तो एक फ्लोर पे गए हैं और
उसके बाद गए नहीं है। अब जाकर जब तीन-चार
दिनों में और उन्होंने चेक किया है तो अब
ये 38,000 हाउसेस रे ये हाई राइज़ेस सिर्फ
कराची में आइडेंटिफाई हो गई। हां ये भी है
लेकिन एक और वजह है। दुनिया भर में मर्दम
शुमारी के दो बुनियादी मेथड हैं। डिफेक्टो
यानी जो जहां इस वक्त है वहां उसे काउंट
किया जाए। जबकि डीजोरे यानी जो उसका
मुस्तकिल पता है उसे वहां काउंट किया जाए।
अब समझ तो सी गए होगे कि पाकिस्तान में
कौन सा तरीका इस्तेमाल होता है। जी
बिल्कुल डी जोरिंग। [संगीत]
अब इससे हुआ ये कि एक तरफ कराची की आबादी
तो कम रही जबकि दूसरी जानिब अंदरून सिंध
की बढ़ती रही। और इसका फायदा यह हुआ कि
अंदरून की सीटें कराची के मुकाबले में
इतनी हो गई कि पीपल्स पार्टी कराची से एक
भी सीट ना जीते तब भी वजीर एआला पीपल्स
पार्टी का ही बनेगा। कराची वालों
[चीखने की आवाज़]
बम
कराची ऐसा है।
खैर फिर वही बात कि चलें सेंसेस में तो
फिर असल जिम्मेदार विफाकी हुकूमत है।
लेकिन आइए अब आपको पीपल्स पार्टी की तरफ
से चली गई एक ऐसी चाल का बताता हूं जिसने
कराची वालों को अपनी नुमाइंदगी के
बुनियादी हक से ही महरूम कर दिया।
कराची के लोग पीपल्स पार्टी से खुश नहीं
है। यह बात सब जानते थे। इवन खुद पीपल्स
पार्टी भी। अब इम्तिहान यह था कि इस
ग्राउंड में मैच यानी लोकल गवर्नमेंट का
इलेक्शन कैसे जीता जाए। क्योंकि अगर किसी
और ने जीत लिया और उसने कराची में काम कर
लिया तो कहीं दीगर शहरों में लोग अपना हक
ना मांगने लग जाए और वही सरदारी राज कहीं
खतरे में ना पड़ जाए। फिर क्या था? इसके
लिए भी एक तरकीब सोची गई।
सिंध हुकूमत ने कराची डिवीजन में 53
यूनियन काउंसिल्स का इजाफा कर दिया है।
यूसीस की तादाद 246 से 299 करने का
नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया। यह तस्वीर
देखिए। लेफ्ट मोस्ट साइड यानी पहली
सिचुएशन देखें तो ब्लू वाज़ अक्सरियत में
है। जबकि रेड की तादाद कम है। अब इसी
मैदान में अगर हमें ब्लू को जितवाना है तो
डायग्राम टू की तरह हल्काबंदियां की जा
सकती हैं। जबकि अगर रेड को जितवाना है तो
डायग्राम थ्री। कुछ इसी तर्ज की कारवाई
कराची के साथ भी हुई। यानी औरंगी जैसे
पीपल्स पार्टी के लिए चैलेंजिंग टाउन में
तकरीबन 7 लाख की आबादी पर सिर्फ आठ यूसीज
बनाई गई। जबकि माणिपुर जैसे फेवरेबल टाउन
में 580 की आबादी पर 11 यूसीस बना दी गई।
और ये तो एक मिसाल है। इसी तरह बलदिया,
मंगोपीर, सराबकोट जैसे फेवरेबल टाउनंस में
एवरेज 50, 55,000 आबादी पर एक यूसी बनाई
गई है। जबकि नाजमाबाद, नॉर्थ नाज़माबाद
जैसे चैनिंग इलाकों में एवरेज यूसी तकरीबन
70,000 आबादी पर बनाई गई। लेकिन मैं कहता
हूं यह भी कुछ नहीं। आपको कुछ और बड़ा
दिखाते हैं। यह मैप देखिए। पहले टाउनंस के
लिहाज से कराची ऐसा दिखता था। अब मैं
चाहूंगा कि आप लोग राइट साइड पर तवज्जो
जिला मलीन में शामिल कड़ाब टाउन पर मरकूज़
कर लें। और अब थ्री टू वन।
[संगीत]
यह जादू देखिए।
आया ना मजा। खैर हुआ क्या वो समझाता हूं।
आसान अल्फाज में यूं समझे कि पहले देही
इलाके कराची में शामिल नहीं थे। यह केएमसी
के मातहत होने के बजाय डायरेक्टली
डिस्ट्रिक्ट काउंसिल से मैनेज होते थे। और
वो इसलिए क्योंकि वहां का लिटरेसी रेट,
आबादी के मसाइल सब कुछ शहरी इलाकों से
मुख्तलिफ होते हैं। लेकिन अब नए ढांचे के
मुताबिक इन देही इलाकों को जिले मरीन में
जम करके कराची में शामिल कर लिया गया। और
नाकदीन के मुताबिक वो इसलिए क्योंकि
पब्लिक सेंटीमेंट्स के अकॉर्डिंग पीपल्स
पार्टी ने यह भांप लिया था कि शायद मेयर
मुंतखिब करने के लिए सीट्स कम पड़ जाए। तो
इन फेवरेबल इलाकों को कि जहां लोग पीपल्स
पार्टी को जवाबदेह नहीं ठहराएंगे कराची
में शामिल कर लिया गया। अब हकीकत यह है कि
नताइज भी इस रीजनिंग को फरोख देते हैं।
कराची वालों मैं आपसे पूछता हूं
क्या तब्दीली पसंद आई?
[संगीत]
लेकिन मैं कहता हूं ये भी कुछ नहीं। थोड़ा
और स्केल बड़ा करते हैं। यूसी से
डिस्ट्रिक्ट लेवल पर आते हैं। भाई अगर
आपने 6 साल पहले कराची का डिस्ट्रिक्ट मैप
देखा हो तो वह इस तरह दिखता था। लेकिन अब
यह कुछ इस तरह दिखता है। क्यों? क्योंकि
2020 में डिस्ट्रिक्ट वेस्ट में एक और
डिस्ट्रिक्ट किमाड़ी ऐड कर दिया गया। और
वो इसलिए बल्कि एक काम करते हैं। पहले
आपको मौका देते हैं कि क्या आप बता सकते
हैं कि इसका पीपल्स पार्टी को क्या फायदा
हुआ होगा?
[संगीत]
माहरीन के मुताबिक डिस्ट्रिक्ट वेस्ट
पीपल्स पार्टी के पक्के जिलों में से एक
था। यानी देखा जाए तो माणपुर, बलदिया,
मंगोपी, मोमिनाबाद जैसे सब इलाके इसी जिले
में थे। अब टारगेट यह था कि यहां से
मैक्सिमम एडवांटेज लिया जाए। लेकिन मसला
यह था कि औसतन हर दूसरे जिले में यूसीस 35
से 40 थी। अब अगर किसी एक जिले में 60
यूसीज बना दी जाती तो हंगामा बरपा हो
जाता। इसलिए किया यह गया कि डिस्ट्रिक्ट
वेस्ट को दो डिस्ट्रिक्ट्स में तकक्सम कर
दिया गया। डिस्ट्रिक्ट किमाड़ी और
डिस्ट्रिक्ट वेस्ट और फिर एक में 32 जबकि
दूसरे में 33 यूसीस बना दी गई। जिसके बाद
यहां मजमुई तौर पर यूसीस का नंबर 65 हो
गया।
खैर सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस कदर
जैरी मेंटेन के बाद भी जब इलेक्शन हाथ से
जाते हुए दिखाई दिया तो जैसे बाद में
नेशनल असेंबली के इलेक्शन में फॉर्म 47 की
मदद लेना पड़ी यहां फॉर्म 12 का इस्तेमाल
हुआ और फिर भी जब मेयर के इंतखाबादत के
लिए अक्सरियत ना बन पाई तो पीटीआई के
अरकान को वोटिंग के लिए पहुंचने ही नहीं
दिया गया। मुर्तदा वहाब को वोट देने वालों
की गिनती का इंदराज हो चुका है और यह खुशी
का इजहार करें आप देख सकते हैं ये पीपल्स
पार्टी के उम्मीदवार हैं मेयर कराची के
लिए और मुर्तबा को वोट देने वालों की
गिनती इस वक्त तो मुकमिल हो चुकी है जबकि
वहाब इसको मेयर बनाया गया जिसको मेरे कल
पे यकीन ही नहीं आ रहा था कि वो मेयर बन
गया इसलिए वो पागलों की तरह उठक बैठक कर
रहे थे जिस दिन वो इलेक्शन जीते थे मेयर
था। मैं हमेशा बार-बार यह रिपीट करता हूं
कि मैंने पहली बार यह रिएक्शन देखा है कि
बंदा खुशी के मारे उठक-बठक करना शुरू हो
गया। क्योंकि वह उसको यकीन नहीं था कि
सरदारी साहब कितने बड़े चमत्कारी हैं। वो
चमत्कार करके दिखा दिया उन्होंने।
भाई इतना सब जानने के बाद आपके दिमाग में
यह सवाल आ रहा होगा कि ठीक है भाई चेरी
मेंटरिंग प्लेइंग फील्ड में ऑल्टरेशन तो
समझ में आ गई लेकिन इससे नुकसान क्या है?
इन श इससे कराची कैसे तबाह हुआ? भाई बात
यह है कि अब कराची के मसाइल की आवाज बुलंद
करने के लिए जो नुमाइंदे मौजूद है इन्हें
कराची वालों ने मुंतखब ही नहीं किया और
इसलिए अब कराची का मुकदमा लड़ा ही नहीं
जाता।
तो अब सोच कर वोट देना। मैं ये नहीं कह
रहा कि नहीं देना। देना है तो दे भी देना।
क्या फर्क पड़ता है? पहले भी दिया था।
निकला नहीं तो क्या हुआ?
क्या हुआ? समझ नहीं आया? तो चल आसान कर
देते हैं। मसला यह है कि बलियाती निजाम को
इतना कमजोर कर दिया गया है कि इसके पास ना
इख्तियार है और ना ही वसाइल। जिसका नतीजा
यह है कि कराची का इंतजाम अमलन बराहेरास्त
उस सिंध हुकूमत के पास है जिसका कराची की
नुमाइंदगी से दूर-दूर तक कोई ताल्लुक ही
नहीं। उनका हल्का ही नहीं है। सियासी
सिस्टम में आदमी उस जगह के लिए काम करता
है जहां से वो इलेक्ट होता है। मरियम नवाज
लाहौर से इलेक्ट होती है। वो लाहौर बुलाना
चाहती है। कराची से इलेक्ट कोई होता है।
काम किसी और से एक्सपेक्ट करते हैं आप। ये
कह रहे हैं। जानते हैं एक चीज होती है
ओेडt। इससे आसान अल्फाज़ में यूं समझ लें
कि पुराने जमाने में शहर में जगह-जगह
चुंगियां बनी होती थी। इससे टैक्स कलेक्ट
किया जाता था और लोकल गवर्नमेंट को दे
दिया जाता था। 1999 में नवाज शरीफ से जब
कुछ ताजुरों ने इस बार-बार की रुकावट पर
एतरादात उठाए तो उन्होंने इसका हल ये
निकाला कि जगह-जगह हर चुंगियों से ऐसे
टैक्स कलेक्ट करना खत्म कर देते हैं जबकि
इसका हिस्सा जीएसटी में बढ़ा देते हैं और
फिर इसका हर शहर के हिसाब से हिस्सा लोकल
गवर्नमेंट को दे दिया जाएगा| यह माकूल
सिस्टम कई साल तक चलता रहा जिसे मजीद
बेहतर मुशर्रफ साहब ने ऐसे कर दिया कि
जीएसटी में ओेडटी की परसेंटेज फिक्स करने
के बजाय इसे वन सिक्स कर दिया गया ताकि
जीएसटी बढ़े तो ऑक्टाइजेला टैक्स भी बढ़े|
ताकि लोकल गवर्नमेंट को ज्यादा से ज्यादा
फायदा हो सके। लेकिन फिर हुई सातवीं
एनएफसी जिसने पूरा स्ट्रक्चर ही तब्दील कर
दिया। इसके मुताबिक अब ऑक्टराइज एला टैक्स
डायरेक्ट लोकल गवर्नमेंट को नहीं बल्कि
सूबों को दिया जाएगा जो सूबे खुद अपनी
मर्जी से बाद में नीचे तकसीम कर देंगे। और
फिर वही हुआ जो 18वीं तरमीम में हुआ था।
इख्तियार और वसाइल सूबों को तो मिल गए
लेकिन सूबे ने नीचे ट्रांसफर ही नहीं किए।
24 अरब आता था उस वक्त जबकि सिंध
गवर्नमेंट का बजट था 450 अरब। आज भी 24
अरब आ रहा है। जबकि सिंध गवर्नमेंट का बजट
3500 अरब हो गया। 8.5 गुना बढ़ गया। 850
गुना और अब तो इंशाल्लाह इंशाल्लाह और भी
बढ़ेगा। तो जो आपके 8 गुना हो गया तो हमने
फिर उसका हिसाब लगाया। हमने जो सारा
रिसर्च हमारी टीम है उन्होंने हिसाब लगाया
कि अगर 2.5% ऑफ़ जीएसटी लोकल गवर्नमेंट्स
को जाए फेडरल गवर्नमेंट की तरफ से जो
सेवंथ एनएफसी से पहले जाता था। उसमें जो
कराची को शेयर मिलता था वो शेयर मिले। तो
इस वक्त कराची को जो इस साल ये जो रवा साल
है इसमें ₹27 अरब मिलते हैं। सिर्फ उसमें
और ट्राई के हाथ में है जीएसटी।
अच्छा अभी तो यह एक चीज है। जानते हैं एक
होता है इंफ्रास्ट्रक्चर सेस। इसे यूं
समझे कि यह रकम वाकई हुकूमत उस शहर को
देती है जहां पोर्ट होता है। और वो इसलिए
क्योंकि पोर्ट की वजह से वहां हैवी
ट्रैफिक चलता है जिससे सड़कें डैमेज हो
जाती हैं। जानते हैं तकरीबन पिछले 10
सालों में इसी कीमत में सिंध हुकूमत ने
कराची को ₹1000 अरब से जायद देना था।
लेकिन अफसोस यह भी ना मिल सका। हालांकि यह
तो वो चीज है जो प्योरली कराची का हक है
क्योंकि जहां तक हमें पता चला है सिंध के
सिर्फ एक ही शहर में पोर्ट्स हैं और वो
कराची है। [संगीत]
खैर ऐसे बहुत से जो हैं लेकिन अगर यूनुस
ढाका साहब के ही एक रिसर्च आर्टिकल की मदद
ली जाए तो पिछले 10 वर्षों में कराची को
तरक्कियाती बजट की मदद में 3360
अरब मिलने थे। लेकिन अफसोस कराची को सिर्फ
₹472 अरब ही दिए गए। और अब आपके सवाल का
जवाब कि चूके नुमाइंदे मुंतखब ही नहीं तो
कराची का असल हक मांगा ही नहीं जाता।
इस शहर से इतना फंड्स जनरेट होते हैं और
डिस्पर्स होते हैं लेकिन कोई आदमी अपना हक
मांगने के लिए नहीं आता।
मुराद अली शाह साहब को इलेक्शन लड़ना है जा
के सेवन से।
के आप कह रहे हो गोलीबार को सही कराए। ये
कह रहे हो? ये कह रहे हो तुम? कि बिराद
अली शाह इलेक्शन लड़ेगा जाके सेवन से और
गलियां बनवाए गोलीबार की और गोलीबार से वो
इलेक्ट हो के आए जो बाद में दुबई चला जाए।
यही कह रहे हो तुम क्या कहना क्या चाह रहे
हो?
ये एनएफसी अवार्ड या इस किस्म की चीजों के
साथ खेलने की कोशिश कर रहे हैं या सोच रहे
हैं इसके साथ खेला जाए तो वो ऐसा है जैसे
आप आग के साथ खेल।
[संगीत]
शायद यही वजह है कि हजार बार एनएफसी
एनएससी यानी वफाक से सूबों के पैसे
ट्रांसफर करने का मुतालबा करने वाली
पीपल्स पार्टी ने आज तक एक बार भी पीएफसी
अवार्ड यानी सूबों से लोकल गवर्नमेंट को
फंड्स की मुनस्सम तकसीम का काम करना गवारा
ही नहीं समझा। जी बिल्कुल आज तक एक बार भी
नहीं। खैर अब बात इतनी हो ही गई है तो आइए
आपको बताता हूं कि केएमसी के साथ क्या
हुआ।
जानते हैं 2005 में जब सिंध हुकूमत का बजट
तकरीबन ₹120 अरब था। कराची की शहरी हुकूमत
का बजट कितना था? तकरीबन 43 अरब। क्योंकि
जब कराची को ओटी भी डायरेक्ट विफाक से
मिलती थी। कराची की खुद की कमाई तो थी ही
और साथ ही सूबा भी फंड्स ट्रांसफर करता
था। अब सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब डॉलर
₹56 का था। यानी यह बजट बना तकरीबन ₹800
मिलियन का। जानते हैं आज 20 साल बाद जब
सिंध हुकूमत का बजट $3000 अरब क्रॉस कर
गया है। केएमसी का बजट कितना है? सिर्फ
$55 अरब और अगर डॉलर की बात की जाए तो वो
$800 मिलियन डॉलर का बजट अब सिर्फ 200
मिलियन का ही रह गया है।
चलिए यह तो बात थी कि सियासी तौर पर कराची
को कैसे तबाह किया गया। आइए अब आपको कुछ
दूसरे तरीके दिखाते हैं। लेकिन क्या ख्याल
है? पहले कराची के दौरे पे ना निकल जाए।
जरा देखें तो सही कराची कितना दबा है।
सड़क की हालत अब तर दी है।
बूंद के लिए जो है वो तरस रहे हैं।
कराची मसाइल का गढ़ बन चुका है।
माणिकीपुर रोड और अतराफ में शदीद ट्रैफिक
जाम है।
पूरा शहर खंडर का मंजर पेश कर रहा है।
गलियां तो खंडरात यहां पर जंग हुई है। अभी
2025 वाली कचरा कुंडी में तब्दील हो चुके
हैं।
पहले क्या खुलेगा स्टेट ऑफ़ हरमूस या
यूनिवर्सिटी रोड? [हंसी]
बहुत अच्छा सवाल है।
भाई इस सब से तो आप वाकिफ ही हैं। यह तो
मैं अब नहीं दोहराऊंगा। वरना मुझे यह
बताने की जरूरत है कि कराची में आखिरी बार
बड़े पैमाने पर तरक्की काम 20078 में हुए
थे। जबकि लाहौर में हालिया कुछ अरसे में
ही लाइन लगी हुई है। मैं तो आपको सिर्फ
सिंध हुकूमत के दो मेगा प्रोजेक्ट और
उसमें हुआ मेगा काम दिखाऊंगा। मंसूबा पानी
का जो था के4 दो साल के अंदर अपने टेन्योर
जो आपने हमें दिया है उसके अंदर यह
कंप्लीट करना चाहते हैं।
के4 का प्रोजेक्ट पूरे शहर कराची को पानी
प्रोवाइड करेगा। उसकी शेड्यूल डेट जो है
2019 जुलाई के अंदर कंप्लीट होने की है।
इंशाल्लाह वो एस पर शेड्यूल कंप्लीट होगा।
इस मंसूबे को इंशाल्लाह हम दो सालों के
अंदर-अंदर और दो सालों में मैं जब ये बात
करता हूं तो दो सर्दियों के सीजन और एक
गर्मियों के सीजन के अंदर-अंदर यह मुकम्मल
किया जाएगा।
इसे 2002 में सोचा गया। सालों इसकी
प्लानिंग की गई। 2011 में इसकी 25 अरब की
कॉस्ट मंजूर हुई। जबकि 2014 में यह
मुकम्मल मंसूबा वफाक और सिंध हुकूमत के
दरमियान मंजूर हो गया। [संगीत] इसे
एग्जीक्यूट सिंध हुकूमत ने करना था। जबकि
कॉस्ट 50-50% सिंध और विफाक दोनों ने अदा
करनी थी। लेकिन अब हुआ क्या? 2016 में
सिंध हुकूमत ने इस मंसूबे पर काम शुरू
किया और फिर जिसे नवंबर 2018 में मुकम्मल
हो जाना था 2018 में पता चला कि ओह इसके
डिज़ाइन में तो नुक्स है और फिर सिर्फ 20%
प्रोग्रेस पर ही काम बंद कर दिया गया।
[संगीत]
खैर जब मामलात ज्यादा खराब हो गए तो सुरते
हाल को बेहतर करने के लिए वफाकी हुकूमत
एक्शन में आई। 2020 में यह काम हंगामी
हालात में वाबडा के सुपुर्द किया गया और
अबकी बार नए प्लान के मुताबिक इस बिगड़े
काम को ठीक करने और मंसूबे को मुकम्मल
करने के लिए जो रकम मुख्तस करना पड़ी वो
बनी 126 अरब यानी अपनी असल कॉस्ट से
तकरीबन 400 फीसद ज्यादा वो अलग बात है कि
इस सबके बावजूद अबकी बार जब इस मंसूबेब को
दिसंबर 2025 को मुकम्मल होना था यह फिर
मुकम्मल ना हो सका क्योंकि वाबडा चेयरमैन
के मुताबिक फंड फंड्स ही नहीं दिए गए और
हां इसमें सुबाई और इफाकी हुकूमत दोनों
कसूरवार हैं।
के4 की तामीर के लिए वाबडा पर एतमाद किया
जिसके लिए हम शुक्रगुजार हैं।
अच्छा यहां एक चीज समझना इंतहाई जरूरी है।
मेन पाइपलाइन का काम तो जरूर वाबडा के
सुपुर्द किया गया था जो विफाक के मातहत
है। जिसके तहत केंजर से कराची तक की
पाइपलाइन बिछना थी। लेकिन दीगर अहम काम
सिंध हुकूमत के ही जिम्मे थे। जैसे
ऑगमेंटेशन यानी कराची में पाइपलाइन की
डिस्ट्रीब्यूशन और पावर सप्लाई जानते हैं
जहां फंड्स की कमी के बावजूद वाबडा ने मेन
पाइपलाइन का काम 64% मुकम्मल कर लिया वहां
ऑगमेंटेशन और पावर सप्लाई का काम 2022 से
अब तक शुरू ही नहीं हो सका। खैर अफसोसनाक
बात यह है कि सैयद गनी साहब के मुताबिक अब
यह कॉस्ट तकरीबन 243 अरब हो गई है। जबकि
काम अब शायद 2027 तक मुकम्मल हुआ।
एक अफसर वहां काम करते थे। उन्होंने मुझसे
शर्त लगाई है। उन्होंने कहा कि अगर K4 का
मंसूबा 5 सालों में भी मुकम्मल कर दिखाएं
तो आप मेरे सर मंडा दें। इतने कॉन्फिडेंस
थे कह रहे नहीं हो कर सकते क्योंकि इसकी
डिज़ ही गलत है।
ये अभी की बात बता रहा हूं। एक हफ्ता पहले
की बात बता रहा हूं।
अच्छा हां अब अगर आपको लग रहा है कि वाकई
यार इस प्रोजेक्ट में तो ना अहली और नॉन
सीरियसनेस की इंतहा हो गई है। और अब इससे
मज़द क्या ही बुरा हो सकता है तो भाई
माज़रत। [संगीत] लेकिन आप गलत हैं। आइए अब
आपको सिंध हुकूमत का एक और शाहकार दिखाते
हैं।
2012 में जायका नामी जापानी कंपनी ने
कराची के ट्रांसपोर्ट के निजाम को बेहतर
करने के लिए एक मुकम्मल प्लान पेश किया।
इस मसूबे का नाम था कराची ट्रांसपोर्टेशन
इंप्रूवमेंट प्रोजेक्ट। इसके तहत कराची
में 175 कि.मी. पर फैली छह बीआईटीस दो
एलआईटीस बनना थी। जबकि गैर फाल कराची
सर्कुलर रेलवे को बहाल होना था। अच्छी बात
यह थी कि सिंध हुकूमत ने इस मंसूबे को
मंजूर कर लिया। लेकिन बुरी या परेशानी की
बात यह है कि इस पूरे मंसूबे में जब से
लेकर अब तक सिर्फ यही अच्छा था। यानी जिस
मंसूबे को 2030 तक मुकम्मल हो जाना था 175
कि.मी. छह बीआरटीज दो एलआईटीस। जानते हैं
14 साल में अब तक सिंध हुकूमत ने कितना
काम मुकम्मल किया? सिर्फ तीन
9 कि.मी. जी आपने सही सुना। यानी जहां
ब्लू, पर्पल, एकवा, ब्राउन, रेड और दीगर
लाइंस बनना थी, सिंध हुकूमत सिर्फ ऑरेंज
लाइन ही बना सकी।
तो जहां पे हम दूसरे सूबों में देखते हैं
कि 10 कि.मी. 15 कि.मी. पर ईयर कर रहे
हैं। हम उनकी जगह पे आशारिया तो 8 कि.मी.
कर रहे हैं। मतलब आधे पाव कि.मी. करीब। इस
लिहाज से अगर अब 150 कि.मी. बाकी है।
कंप्लीट तो नहीं हुए प्रोजेक्ट्स बाकी।
सिर्फ ग्रीन लाइन का एक 20 कि.मी. हुआ है।
ऑरेंज लाइन के 3.9 कि.मी. तो बाकी जो 150
कि.मी. होने थे केटीआईपी के उसको पूरा
करने में पांच [संगीत] सिद्धियां चाहिए
होंगी। 535 साल का अगर आप सीधा हिसाब
लगाएं।
हैरानक बात यह है कि दूसरों सूबों के
बरक्स इस सबके बाद इतने पैसे, इतने फंड्स
होने के बावजूद सिंध हुकूमत कराची के
अक्सर प्रोजेक्ट के लिए वर्ल्ड बैंक,
एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसे इदारों से कर्ज
भी लेती है।
फिर भी प्रोजेक्ट्स मुकम्मल नहीं होते। अब
क्या ही बोले
कर्जा तो उनका होता है लेकिन हकीकत ये है
आप किसी से भी पूछे जितने भी ब्यूरोक्रेट
हैं [संगीत] सेटिंग तो कोई नहीं बताएगा
आपको रिटायर बताएंगे उससे आधे से ज्यादा
रकम जो है उन्हीं को वापस जा रहा है वो
कहते हैं कि भाई ये पांच बंदे ये 10 बंदे
हमारे कंसलटेंट हैं आपने इनको रखना है
उनकी तनख्वाया सुन के आप परेशान होंगे और
उसके बाद उनकी फरमाइशें इतनी होती है ये
भी करो वो भी करो उस फरमाइशों को पूरापूरा
करते-करते आप यकीन माने 40 50 या 60% वही
लोन उनको वापस चला जाता है। तो बाकी जो
बचता है उसमें कमीशन भी लेनी होती है।
[संगीत]
अच्छा नाकेरीन के मुताबिक असल मसला वैसे
चाहने का है क्योंकि ऐसा नहीं है कि अगर
पीपल्स पार्टी चाहे तो वो कर नहीं सकती।
क्योंकि हम देखते हैं कि अगर बात इलिट्स
और बासर लोगों के लिए एक डीएचए को दूसरे
डीएचए और बहरिया से मिलाने की हो तो 39
कि.मी. लंबी शहर भुट्टो भी वक्त पर
मुकम्मल हो जाती है। खैर बहुत सैर हो गई।
चल वापिस अपने मेन टॉपिक की तरफ चलते हैं।
18वीं तरमी के बाद सिंध हुकूमत ने एक-एक
करके वो इदारे जो कराची की मकामी हुकूमत
के मातहत थे। उन्हें सुबई तहवील में ले
लिया।
अब आपने बिल्डिंग कंट्रोल को कराची से
लेकर के सिंध का बना दिया। सॉइल वेस्ट
मैनेजमेंट कराची से आपका गार्बेज लिफ्ट
नहीं होता। आपने सिंध का बना दिया। वाटर
बोर्ड को बोर्ड था उसको आपने कॉपोरेशन बना
दिया। ऐसे ही आपने बहुत सारे महकमे अलग
बना दिए तोड़ करके। यानी आसान अल्फाज़ में
यूं समझ लें कि आर्टिकल 14A के बर खिलाफ
जो बताता है कि लोकल गवर्नमेंट्स को
एंपावर करना है। लोकल गवर्नमेंट्स और मेयर
को बिल्कुल ही नाकारा बना दिया गया। खैर
अब शायद आपके दिमाग में ये सवाल आ रहा हो
कि पीपल्स पार्टी ने आखिर ऐसा क्यों किया?
और हां एक सवाल यह भी कि अब जबकि मेयर भी
इन्हीं का है तो इसे ठीक क्यों नहीं किया
गया? सिंध के अंदर जो खास हालात वो यह हैं
जो आपने बात की कि पीपल्स पार्टी जो है वह
चीफ मिनिस्टर इ करवा सकती है सिर्फ दही
सिंध से जीत के तो उसको शहरी सिंध पे काम
करने का कोई शौक ही नहीं है। और नाकरीदीन
के मुताबिक दूसरा यह कि मेयर आज है कल ना
हो तो अगर इख्तियारात मेयर और लोकल
गवर्नमेंट्स को दे दिए गए और उन्होंने कुछ
काम कर लिया तो कहीं सरदारी राज के लिए
मसला ना हो जाए। वैसे आपको पता है चाहे
केएमसी हो या यूसीस इस कदर बेख्तियारी के
बावजूद अगर कोई काम इन्हें करना हो कोई
ठेका देना हो तो करप्शन का क्या आलम है
1820 सालों को अगर उससे पीछे चले जाए तो
10 से 15% जो है वो कमीशन का रिक रेशियो
था जिसमें से 1% 2% इंजीनियर चीफ इंजीनियर
ऊपर तक जाते-जाते 15% तक था। अभी आप सुन
के हैरान हो जाएंगे। बहुत सारे ऐसे महकमे
हैं जहां पर आपको ठेका अवार्ड किया जाता
है ना तो कहते हैं 8 से 10% आप एडवांस
हमें दे दें। उसके बाद हर चेक पे जो है
आपसे 15 20 25% जो है वो लेंगे। टैक्सेस
काट के अगर 50 60% तो इस तरह से जा रहे
हैं। तो बाकी आपके पास अगर 40 या 45% बचते
हैं तो 10 12% 15% ठेकेदार भी तो रखेगा तो
फिर काम क्या हो रहा है?
अब जाहिर है गैर मुंतखब सेटअप को बिना
किसी मसले के चलना है तो काबिल लोग जिनका
हक है वो तो सूटेबल रहेंगे नहीं काबिल लोग
तो सवाल उठाएंगे मसला पैदा करेंगे इसलिए
इस मसले से निपटने के लिए ब्यूरोक्रेसी को
हवाले किया गया करप्ट और अपने वफादार
लोगों के
इनकी खूबी यह है कि ये ऐसे बदनाम तरीन
लोगों को करप्ट लोगों को ढूंढ-ढूंढ के आ
के बड़े-बड़े ओदों पर बिठा देते हैं। फिर
वह इंकार नहीं करते हैं। हो सकता है इनको
दो% नहीं मिल रहा हो। लेकिन दो 4% का
क्वांटम इतना बड़ा है कि बिलियंस बन जाते
हैं। तो इनकी वो ना नहीं करते हैं। वो
कहते हैं ठीक है सब अच्छा है।
ना जाने कराची वालों से पीपल्स पार्टी को
कितना बैर है कि गुजस्ता 18 सालों में
सैयद गनी के सिवा कराची से मुंतखब पीपल्स
पार्टी के किसी एमपीए को वजीर नहीं बनाया
गया।
[संगीत]
सिंध ने और बांग्लादेश ने पाकिस्तान बनाया
है। आपने तो बनाया नहीं। आप तो माइग्रेशन
करके आए हैं। भगाए गए और आप भाग के आके
यहां आपने पनाह ली। हमने आपको पनाह दी।
खैर, अब एक बार फिर डॉक्यूमेंट्री का अहम
मोड़। अब तक हमने जो बताया और दिखाया है,
इसमें मेन यही दिख रहा है ना कि पीपल्स
पार्टी पैसा लगा नहीं रही, दे नहीं रही
वगैरह। आपके दिमाग में यह सवाल नहीं आ रहा
कि फिर इतना सारा पैसा जाता कहां है?
सिर्फ कराची में जो पानी है कितने रुपयों
का पानी फरोख्त होता है? हमने सर्वे किया
है कोई ₹ अरब की रोसाना पानी की सेल है
जिसमें एक अरब ऊपर ऊपर जाता अशराफिया को
बाकी ₹ अरब के नीचे बंदर बाट होती है।
कराची सब्जी मंडी में कोल्ड स्टोरेज के
मुख्तलिफ प्रोजन लेके आए। एक ऐसा बंदा
जिसको नवाजने के लिए उस वो मीडिया की
पर्सनालिटी है उसके भाई को ठेका दिया गया।
छ से 7 अरब कोल्ड स्टोरेज का। आप जाके
कराची सब्जी मंडी चक्कर लगाएं। ये कोल्ड
स्टोरेज कहां बने हैं? आप चेक कराएं ना
कहां बने हैं। सिर्फ इसलिए कि वो मीडिया
की पर्सनालिटी है। उसके भाई को राजी करें।
उनको आराम करने के लिए आप अरबों रुपए दे
रहे हैं। यह ठेके वहां उनको पंजाब में
क्यों नहीं मिल रहे? यह ठेके उनको केपीके
में क्यों नहीं मिल रहे?
लेकिन यह तो छोटे बेनिफिट और छोटे
बेनिफिशरीज हैं। इनसे मिलिए। यह है डॉक्टर
आसिम हुसैन। जी सही सोचा जियााउद्दीन
वाले। लेकिन अहम बात यह है कि ज़रदारी साहब
के वो करीबी दोस्त जो सिंध हायर एजुकेशन
कमीशन के चेयरमैन, सेनेटर, वज़र-ए-रआज़म के
एडवाइजर और पेट्रोलियम के मिनिस्टर भी रह
चुके हैं। जानते हैं इन्हें हाल ही में
जियााउद्दीन यूनिवर्सिटी के नाम पे
एजुकेशन सिटी में कितनी जमीन दी गई है? 20
एकड़ जमीन। लेकिन मैं कहता हूं यह तो कुछ
भी नहीं। अब कुछ मजीद खास लोगों से
मिलवाते हैं। इनसे मिलिए। यह है अजरा
पिचोहो सरदारी साहब की सगी बहन जो ज़ैबिस
यूनिवर्सिटी की को चेयर पर्सन और चांसलर
हैं। जानते हैं इन्हें कितना नवाजा गया?
इन्हें ज़ैबिस के नाम पर पहले कराची के
अतराफ खारो में 500 एकड़ जमीन दी गई और अब
उसी एजुकेशन सिटी में 300 एकड़ जमीन से
नवाजा गया। सिर्फ समझने के लिए जान लें कि
एक पूरे फुटबॉल स्टेडियम का साइज हद से हद
16 से 17 एकड़ होता है।
[संगीत]
अच्छा अभी तो मैंने आपको ज़बेश यूनिवर्सिटी
की बोर्ड ऑफ गवर्नर की लिस्ट नहीं दिखाई।
उधर तो अलग ही गेम चल रही है। यानी वहां
जरदारी साहब की एक बेटी बखतावर चेयर पर्सन
है। बहन चांसलर हैं। जबकि दूसरी बेटी
आसिफा बोर्ड ऑफ गवर्नर की मेंबर हैं। वैसे
एजुकेशन सिटी का नाम आ ही गया है तो आपको
बताऊं यह भी बहुत ही बड़ी स्टोरी है। यानी
मुझे आपको शायद मालूम ही ना हो कि हमारे
शहर में ऑक्सफोर्ड कैंब्रिज के मजमूई रबे
से भी बड़ी एक एजुकेशनल सिटी है। जहां आगा
खान, जियााउद्दीन, ज़ैबेस समेत एक साथ 50
यूनिवर्सिटीज मौजूद हैं। अरे हैरान मत हो।
ये सब पेपर पर है क्योंकि फिजिकली तो वहां
ना कोई यूनिवर्सिटी है और ना ही वहां कोई
तालीम दी जाती है। वहां तो अभी सिर्फ
खेतीबाड़ी होती है।
1520 साल हो गए हैं वो ऐसी जमीनें पड़ी
है। कोई उनसे पूछने वाला नहीं कि भाई फर्ज
करो कि मैंने 500 में या 5000 में या ₹
लाख में उस वक्त एकड़ जमीन दी थी जिसकी अब
वैल्यू 5 करोड़ है या 10 करोड़ है। तो अभी
तक आपका वो इदारा या आपका एजुकेशन का
इंस्टट्यूट क्यों नहीं बना है? देखिए आप
अलॉट तो करते जाते जाएंगे लेकिन आप उनको
यह नहीं पूछेंगे कि आप कितने अरसे में
बनाएंगे यह इसका बनाने का पर्पस क्या था
जब आपके इंस्टट्यूट बन जाएंगे तो कराची
में आपके बहुत सारे बच्चे उससे मुस्तफीद
होंगे डिग्रियां लेंगे पूरी दुनिया में
चले जाएंगे और वहां के लिए भी कह रहे हैं
कि एक शख्स काबिज बैठे हैं [संगीत] उनका
मनपसंद बंदा बैठा है जो 8 10 सालों से एक
ही पीढ़ी बैठा है भाई क्यों एजुकेशन सिटी
10-15 सालों से एक ही पीढ़ी क्यों बैठा
है?
[संगीत]
खैर बैक टू द मेन टॉपिक लेकिन बात सिर्फ
जमीनों और पैसों की नहीं। वरना हम सब
जानते हैं कि ओमनी ग्रुप पर किसका हाथ है
और किसने कितने पैसे बनाए। लेकिन सल्तनत
के वफादार होने के कुछ दूसरे फ़वायद भी
हैं। जानते हैं पुलिस में यह कानून है कि
सीनियर अफसरान 10 साल से जायद एक ही सूबे
में नहीं रह सकते। उनके लिए लाजमी होता है
कि किसी और सूबे में उनकी पोस्टिंग की
जाए। जानते हैं कराची में एक इदारा है
जिसका नाम है एसएसयू जिसे उनके बहुत ही
खास मकसूद मेमन साहब लीड करते हैं। पिछले
16 सालों में जब पता नहीं औरों के कितने
तबादले हो गए मकसूद साहब को सिंध और
एसएसयू से कोई जुदा ना कर सका। खैर मसलों
की तो बहुत बात हो गई। लेकिन आइए अब सबसे
जरूरी बात और वो ये कि आखिर शहर कायद का
हल क्या है?
अच्छा यहां एक इंपॉर्टेंट मैसेज जैसे
कराची के साथ होता है कि इसे ठीक करने के
बजाय असल मसले को एड्रेस करने के बजाय हम
एक दूसरे पर उंगलियां उठाते रहते हैं और
कराची का मसला मजीद खराबतर हो जाता है। एक
और सिमिलर चीज है जिसे एड्रेस करना बहुत
इंपॉर्टेंट है। पाकिस्तान में हर चार में
से एक नौजवान डिप्रेशन और ए्जायटी का
शिकार है। लेकिन हमारे यहां मामूल यह है
कि इस सबको मेंटल हेल्थ के बजाय सुपर
नेचुरल चीजों से जोड़ दिया जाता है। यानी
किसी ने इस पे काला जादू कर दिया है, जिन
चढ़ गया है, अज़ाब है वगैरह। और बजाय इसके
कि क्वालिफाइड लोगों से कंसल्ट किया जाए।
हम जादू की तोड़ करने वालों और दीगर लोगों
में फंसे रह जाते हैं। इसलिए इट्स वेरीेंट
कि अब हम मेंटल हेल्थ इश्यूज को सीरियसली
लें। इन्हें मेडिकल कंडीशन कंसीडर करें
ताकि बरव नौजवानों का इलाज हो सके।
[संगीत]
यह है मेक्सिको सिटी। लातीनी अमेरिका की
पांचवी बड़ी मशत टूरिस्ट हब और 2 करोड़ से
जायद आबादी के बावजूद एक इंतहाई डेवलप्ड
शहर। लेकिन आपको बताऊं यह हमेशा से ऐसा
नहीं था। 1980 की दहाई में मेक्सिको सिटी
दुनिया के बदतरीन शहरों में शुमार होता
था। जहां फजाई आलूदगी उरूज पर
इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह, पानी का शदीद
बोहरान और जुराइम का अंधा राज था। माहिरीन
के मुताबिक इस सब की मेन वजह यह थी कि इस
शहर का मेयर ना बा इख्तियार था, ना उसे इस
शहर के लोगों ने मुंतखब किया होता था और
जाहिर है ना वह उनके सामने जवाबदेह होता
था। बल्कि वो तो दूर बैठे एक सदर का
वफादार होता था जिसने उसे मुंतखब किया
होता था। लेकिन फिर जब हालात बहुत ज्यादा
ही खराब हो गए तो 1997 में एक तारीखी
फैसला हुआ। इस शहर के लोगों को पहली बार
अपना मियर मुंतखब करने का हक मिल गया और
साथ ही सड़कें, पानी, पुलिस समेत सब कुछ
शहरी हुकूमत के हवाले कर दिया गया। और
उसके बाद मेक्सिको सिटी की कैसी किस्मत
बदली फिर वो तो हमारे सामने ही है।
[संगीत]
अब शहर कायद की बात की जाए तो हमारा भी
कुछ ऐसा ही है। माहरीन के मुताबिक हमारा
मसला भी यही है और हां इसका हल भी।
कराची को कराची की टेरिटरी रहने दें।
कराची को कराची का हक दें। कराची को कराची
के लोगों के उस पे हुकूमत हुक्मरानी दे।
मेयर का जो कांसेप्ट है उसको हम कहते थे
फादर ऑफ [संगीत] द सिटी।
तमाम बड़े शहर जैसे दिल्ली है, बॉम्बे है,
न्यूयॉर्क है, पेरिस है। इन सारे
गवर्नमेंट में सिटी गवर्नमेंट होती है।
कराची का कोई सशन नहीं है जिसके अंदर
कराची के लोगों को कराची पे इख्तियार ना
दिया जाए। फादर ऑफ द सिटी इसीलिए कहते हैं
कि बाप के पास वो तमाम इख्तियारात होते
हैं और बाप के पास वो तमाम जिम्मेदारियां
होती हैं। शहर के बच्चों को लोगों को अपना
बच्चा समझ करके उसको आगे लेकर के चलता है।
उसकी जिम्मेदारी होती है।
आप लोकल गवर्नमेंट को एमावर कर दें। जिसके
हाथ में पुलिस हो, [संगीत] तालीम हो, सेहत
हो, रोड रस्ते हो और पानी हो जो उसका हक
बनता है डेवलपमेंट फंड में से वो डालना
[संगीत] शुरू कर दें। मैं आपको यकीन
दिलाता हूं अगले 5 साल में कराची के
ज्यादातर मसाइल हल हो जाएंगे।
[संगीत]
[संगीत]
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यह डॉक्यूमेंट्री इस बात की पड़ताल करती है कि पीपल्स पार्टी के शासन में कराची का पतन कैसे हुआ। इसमें 18वें संशोधन के बाद स्थानीय सरकारों के अधिकार कम होने, जनसंख्या जनगणना में धांधली, प्रशासनिक फेरबदल, फंड्स की अनियमितता और कराची के विकास कार्यों के लिए मिलने वाले बजट की हेराफेरी पर विस्तार से चर्चा की गई है। वीडियो अंत में मेक्सिको सिटी का उदाहरण देते हुए कराची के समाधान के रूप में एक सशक्त स्थानीय सरकार (Empowered Local Government) की आवश्यकता पर जोर देता है।
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